ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
नाचिकेतम्=नचिकेताके; सनातनम्=(इस) सनातन; उपाख्यानम्=उपाख्यानका; उक्त्वा=वर्णन करके; च=और; श्रुत्वा=श्रवण करके; ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें; महीयते=महिमान्वित होता है (प्रतिष्ठित होता है) ॥ १६ ॥
व्याख्या— यह जो इस अध्यायमें नचिकेताके प्रति यमराजका उपदेश है, यह कोई नयी बात नहीं है; यह परम्परागत सनातन उपाख्यान है। बुद्धिमान् मनुष्य इसका वर्णन और श्रवण करके ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठावाला होता है॥ १६॥
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते।
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
यः=जो मनुष्य; प्रयतः=सर्वथा शुद्ध होकर; इमम्=इस; परमम् गुह्यम्=परम गुह्य—रहस्यमय प्रसङ्गको; ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामें; श्रावयेत्=सुनाता है; वा=अथवा; श्राद्धकाले=श्राद्धकालमें; [ श्रावयेत् ]=(भोजन करनेवालोंको) सुनाता है; तत्=(उसका) वह श्रवण करानारूप कर्म; आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमें (अविनाशी फल देनेमें) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमें समर्थ होता है॥ १७॥
व्याख्या— जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीसे इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामें सुनाता है अथवा श्राद्धकालमें भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसका वह वर्णनरूप कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है, अनन्त होनेमें समर्थ होता है। दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है॥ १७॥
॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥