ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ
द्वितीय अध्याय
प्रथम वल्ली
**सम्बन्ध—**तृतीय वल्लीमें यह बतलाया गया कि वे परब्रह्म परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्तमान हैं, परंतु सबको दीखते नहीं। कोई विरला ही उन्हें सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा देख सकता है। इसपर यह प्रश्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदयमें हैं तब उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूप नेत्रोंद्वारा क्यों नहीं देख लेते? कोई विरला ही क्यों देखता है? इसपर कहते हैं—
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-
स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥
स्वयम्भूः=स्वयं प्रकट होनेवाले परमेश्वरने; खानि=समस्त इन्द्रियोंके द्वार; पराञ्चि=बाहरकी ओर जानेवाले ही; व्यतृणत्=बनाये हैं; तस्मात्=इसलिये (मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा प्रायः); पराङ्=बाहरकी वस्तुओंको ही; पश्यति=देखता है; अन्तरात्मन्=अन्तरात्माको; न=नहीं; कश्चित् धीरः=किसी (भाग्यशाली) बुद्धिमान् मनुष्यने ही; अमृतत्वम्=अमर पदको; इच्छन्=पानेकी इच्छा करके; आवृत्तचक्षुः=चक्षु आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंकी ओरसे लौटाकर; प्रत्यगात्मानम्=अन्तरात्माको; ऐक्षत्=देखा है॥ १॥
**व्याख्या—**शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध—इन्द्रियोंके ये सभी स्थूल विषय बाहर हैं। इसका यथार्थ ज्ञान करानेके लिये इन्द्रियोंकी रचना हुई है; क्योंकि इनका ज्ञान हुए बिना न तो मनुष्य किसी विषयके स्वरूप और गुणको ही जान सकता है और न उसका यथायोग्य त्याग एवं ग्रहण करके भगवान्के इन्द्रिय-