भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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१३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २

निर्माणके उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये उनके द्वारा नवीन शुभकर्मोंका सम्पादन ही कर सकता है। इन्द्रिय-निर्माण इसीलिये है कि मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा स्वास्थ्यकर, सुबुद्धिदायक, विशुद्ध विषयोंका ग्रहण करके सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर हो। इसीलिये स्वयंभूभगवान्‌ने इन्द्रियोंका मुख बाहरकी ओर बनाया, परंतु विवेकके अभावसे अधिकांश मनुष्य इस बातको नहीं जानते और विषयासक्तिवश उन्मत्तकी भाँति आपातखमणीय परिणाममें भगवान्‌से हटाकर दुःखशोकमय नरकोंमें पहुँचानेवाले अशुद्ध विषयभोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। वे अन्तर्यामी परमात्माकी ओर देखते ही नहीं। कोई विरला ही बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होता है जो सत्सङ्ग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपासे अशुद्ध विषयभोगोंकी परिणामदुःखताको जानकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे लौटाकर, उन्हें भगवत्सम्बन्धी विषयोंमें लगाकर अन्तरात्माको—अन्तर्यामी परमात्माको देखता है॥ १॥

पराचः कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥

[ ये ] बालाः=जो मूर्ख; पराचः कामान्=बाह्य भोगोंका; अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं (उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं); ते=वे; विततस्य=सर्वत्र फैले हुए; मृत्योः=मृत्युके; पाशम्=बन्धनमें; यन्ति=पड़ते हैं; अथ=किंतु; धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य; ध्रुवम्=नित्य; अमृतत्वम्=अमरपदको; विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर; इह=इस जगत्में; अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको (भी); न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते ॥ २॥

व्याख्या— जो बाह्य विषयोंकी चमक-दमक और आपातरमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एवं अमूल्य मनुष्य-जीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे