ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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सर्वकालव्यापी मृत्युके पाशमें बँध जाते हैं, दीर्घकालतक नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म धारण करके बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं, परंतु जो बुद्धिमान् हैं, वे इस विषयपर गहराईसे यों विचार करते हैं कि ये इन्द्रियोंके भोग तो जीवको दूसरी योनियोंमें भी पर्याप्त मिल सकते हैं। मनुष्य-शरीर उन सबसे विलक्षण है। इसका वास्तविक उद्देश्य विषयोपभोग कभी नहीं हो सकता। इस प्रकार विचार करनेपर जब यह बात उनकी समझमें आ जाती है कि इसका उद्देश्य अमृतस्वरूप नित्य परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करना है और वह इसी शरीरमें प्राप्त किया जा सकता है, तब वे सर्वतोभावे उसीकी ओर लग जाते हैं। फिर वे इस विनाशशील जगत्में क्षणभङ्गुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करते, इनसे सर्वथा विरक्त होकर सावधानीके साथ परमार्थ-साधनमें लग जाते हैं ॥ २ ॥
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्सपर्शाःश्र श्र मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ ३ ॥
येन=जिसके अनुग्रहसे (मनुष्य); शब्दान्=शब्दोंको; स्पर्शान्=स्पर्शोंको; रूपम्=रूप-समुदायको; रसम्=रस-समुदायको; गन्धम्=गन्धसमुदायको; च=और; मैथुनान्=स्त्री-प्रसंग आदिके सुखोंको; विजानाति=अनुभव करता है; एतेन एव=इसीके अनुग्रहसे (यह भी जानता है कि); अत्र किम्=यहाँ क्या; परिशिष्यते=शेष रह जाता है; एतत् वै=यह ही है; तत्=वह परमात्मा (जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ३ ॥
व्याख्या—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक सब प्रकारके विषयोंका और स्त्री-सहवासादिसे होनेवाले सुखोंका मनुष्य जिस परम देवसे मिली हुई ज्ञानशक्तिके द्वारा अनुभव करता है, उन्हींकी दी हुई शक्तिके इनकी क्षणभङ्गुरताको देखकर वह यह भी समझ सकता है कि इन सबमेंसे ऐसी कौन वस्तु है, जो यहाँ शेष रहेगी? विचार करनेपर यही समझमें आता है कि ये सभी पदार्थ प्रतिक्षण बदलनेवाले होनेसे विनाशशील हैं। इन सबके परम कारण एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही नित्य हैं। वे पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे। अतः हे