भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

नचिकेता! तुम्हारा पूछा हुआ वह ब्रह्मतत्त्व यही है, जो सबका शेणी है, सबका पर्यवसान है, सबकी अवधि और सबकी परम गति है॥ ३ ॥

स्वज्ज्ञानं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ ४ ॥

स्वज्ज्ञानम् च=स्वप्नके दृश्योंको और; जागरितान्तम्=जाग्रत्-अवस्थाके दृश्योंको; उभौ=इन दोनों अवस्थाओंके दृश्योंको (मनुष्य); येन=जिससे; अनुपश्यति=बार-बार देखता है; [ तम् ]=उस; महान्तम्=सर्वश्रेष्ठ; विभुम्=सर्वव्यापी; आत्मानम्=सबके आत्माको; मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य; न शोचति=शोक नहीं करता॥ ४ ॥

व्याख्या —जिस परमात्माके सहयोगसे यह जीवात्मा स्वप्नमें और जगत्में होनेवाली समस्त घटनाओंका बारंबार अनुभव करता रहता है, इन सबको जाननेकी शक्ति इसको जिस परब्रह्म परमेश्वरसे मिली है, जिसकी कृपासे इस जीवको उस (परमात्मा)-की विज्ञानशक्तिका एक अंश प्राप्त हुआ है, उस सबकी अपेक्षा महान् सदा-सर्वदा सर्वत्र व्याप्त परब्रह्म परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता॥ ४ ॥

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते॥ एतद्वै तत्॥ ५ ॥

यः=जो मनुष्य; मध्वदम्=कर्मफलदाता; जीवम्*=सबको जीवन प्रदान करनेवाले; (तथा) भूतभव्यस्य=भूत, (वर्तमान) और भविष्यका; ईशानम्=शासन करनेवाले; इमम्=इस; आत्मानम्=परमात्माको; अन्तिकात् वेद=(अपने) समीप जानता है; ततः [ सः ]=उसके बाद वह; न विजुगुप्सते=(कभी) किसीकी निन्दा

  • यहाँ 'जीव' शब्द परमात्माके लिये ही प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि भूत, भविष्य और वर्तमानका शासक जीव नहीं हो सकता। प्रकरण भी यहाँ परमात्माका है, जीवका नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र १।३।२४ का शाङ्करभाष्य)।