भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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बल्ली १ ]

कठोपनिषद्

१३९

नहीं करता; एतत् वै=यह ही (है); तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ५ ॥

व्याख्या —जो साधक सबको जीवन प्रदान करनेवाले, जीवोंके परम जीवन और उन्हें उनके कर्मोंका फल भुगतानेवाले तथा भूत, वर्तमान और भावी जगत्का एकमात्र शासन करनेवाले उस परब्रह्म परमेश्वरको इस प्रकार समझ लेता है कि 'वह अन्तर्यामीरूपसे निरन्तर मेरे समीप मेरे हृदयमें ही स्थित है और इससे स्वाभाविक ही यह अनुमान कर लेता है कि इसी प्रकार वे सर्वनियन्ता परमात्मा सबके हृदयमें स्थित हैं, वह फिर उनके इस महिमाय स्वरूपको कभी नहीं भूल सकता। इसलिये वह कभी किसीकी निन्दा नहीं करता, किसीसे भी घृणा या द्वेष नहीं करता। नचिकेता! तुमने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था, वह यही है, जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है ॥ ५ ॥

सम्बन्ध —अब यह बतलाते हैं कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही उत्पन्न हुए हैं; अतः जो कुछ भी है, सब उन्हींका रूपविशेष है। उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत्के अभिन्ननिमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपोंमें स्थित हैं।

यः पूर्व तपसो जातमदभ्यः पूर्वमजायत।

गृहो प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेर्भिव्यपश्यत् ॥ एतद्वै तत् ॥ ६ ॥

यः =जो; अदभ्यः =जलसे; पूर्वम् =पहले; अजायत =हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; [ तम् ] =उस; पूर्वम् =सबसे पहले; तपसः जातम् =तपसे उत्पन्न; गृहाम् प्रविश्य =हृदय-गुफामें प्रवेश करके; भूतेर्भिः [ सह ] =जीवात्माओंके साथ; तिष्ठन्तम् =स्थित रहनेवाले परमेश्वरको; यः =जो पुरुष; व्यपश्यत् =देखता है (वही ठीक देखता है); एतत् वै =यह ही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ६ ॥

व्याख्या —जो जलसे उपलक्षित पाँचों महाभूतोंसे पहले हिरण्यगर्भ ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुए थे, उन अपने ही संकल्परूप तपसे प्रकट होनेवाले और सब जीवोंके हृदयरूप गुफामें प्रविष्ट होकर उनके साथ रहनेवाले परमेश्वरको