भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

जो इस प्रकार जानता है कि 'सबके हृदयमें निवास करनेवाले सबके अन्तर्यामी परमेश्वर एक ही हैं, यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींकी महिमाका प्रकाश करता है, वही यथार्थ जानता है। वे सदा सबके हृदयमें रहनेवाले ही ये तुम्हारे पूछे हुए परब्रह्म परमेश्वर हैं॥६॥

सम्बन्ध— उन्हीं परब्रह्मका अब अदितिदेवीके रूपसे वर्णन करते हैं—

या प्राणेन सम्भवत्यदितिदैवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिव्यंजायत ॥ एतद्वै तत् ॥७॥

या=जो; देवतामयी=देवतामयी; अदिति=अदिति; प्राणेन=प्राणोंके सहित; सम्भवति=उत्पन्न होती है; या=जो; भूतेभिः=प्राणियोंके सहित; व्यंजायत=उत्पन्न हुई है; (तथा जो) गुहाम्=हृदयरूपी गुफामें; प्रविश्य=प्रवेश करके; तिष्ठन्तीम्=वहीं रहनेवाली है उसे; (जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है,) एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥७॥

व्याख्या— जो सर्वदेवतामयी भगवती अदितिदेवी पहले-पहल उस पर-ब्रह्मके संकल्पसे सब जगत्की जीवनी शक्तिके सहित उत्पन्न होती है तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंको बीजरूपसे अपने साथ लेकर प्रकट हुई थी। हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट होकर वहीं रहनेवाली वह भगवती—भगवान्की अचिन्त्यमहाशक्ति भगवान्से सर्वथा अभिन्न है, भगवान् और उनकी शक्तिमें कोई भेद नहीं है, भगवान् ही शक्तिरूपसे सबके हृदयमें प्रवेश किये हुए हैं। हे नचिकेता! वे ही ये ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था।

अथवा—जननीरूपमें समस्त देवताओंका सृजन करनेवाली होनेके कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूहका अदन—भक्षण करनेवाली होनेसे भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणोंके सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियोंके साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियोंकी हृदय-गुफामें प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वरकी महाशक्ति वस्तुतः उनका प्रतीक ही हैं। स्वयं परमेश्वर ही इस