ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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रूपमें अपनेको प्रकट करते हैं। ये ही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें नचिकेता! तुमने पूछा था ॥७॥
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभूतौ गर्भिणीभिः ।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्विष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः * ॥
एतद्वै तत् ॥८॥
[ यः ]=जो; जातवेदाः=सर्वज्ञ; अग्निः=अग्निदेवता; गर्भिणीभिः=गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा; सुभूतः=भली प्रकार धारण किये हुए; गर्भः=गर्भकी; इव=भाँति; अरण्योः=दो अरण्योंमें; निहितः=सुरक्षित है—छिपा है (तथा जो); जागृवद्भिः=सावधान (और); हविष्मद्भिः=हवन करनेयोग्य सामग्रियोंसे युक्त; मनुष्येभिः=मनुष्योंद्वारा, दिवे दिवे=प्रतिदिन; ईड्यः=स्तुति करनेयोग्य (है); एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥८॥
व्याख्या—जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रीके द्वारा धारण किया हुआ शुद्ध अन्न-पानादिसे परिपुष्ट बालक गर्भमें छिपा रहता है, उसी प्रकार जो सर्वज्ञ अग्निदेवता अंधर और उत्तर अरणि (ऊपर-नीचेके काछखण्ड)-के भीतर छिपे हुए हैं तथा अग्निविद्याके जाननेवाले, प्रयत्नशील, सावधान, श्रद्धालु, सब प्रकारकी आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्यगण प्रतिदिन जिनकी स्तुति और आदर किया करते हैं, वे अग्निदेवता सर्वज्ञ परमेश्वरके ही प्रतीक हैं। नचिकेता! ये ही वे तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥८॥
यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अपितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥ ९ ॥†
यतः=जहाँसे; सूर्यः=सूर्यदेव; उदेति=उदय होते हैं; च=और; यत्र=जहाँ; अस्तम् च=अस्तभावको भी; गच्छति=प्राप्त होते हैं; सर्वे=सभी; देवाः=देवता;
- यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल ३ सू० २९।२) में और सामवेद (पूर्वाचिक खण्ड ८।७) में भी है।
† अथर्ववेद १०।८।१९।