ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
तम्=उसीमें; अर्पिता:=समर्पित हैं; तत् उ=उस परमेश्वरको; कश्चन=कोई (कभी भी); न अत्येति=नहीं लाँध सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ९ ॥
व्याख्या —जिन परमेश्वरसे सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमामें ही यह सूर्यदेवताकी उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है; उन परब्रह्ममें ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं—सब उन्हींमें ठहरे हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है जो उन सर्वोत्कृष्ट, सर्वमय, सबके आदि, अन्त आश्रयस्थल परमेश्वरकी महिमा और व्यवस्थाका उल्लङ्घन कर सके। सर्वतोभावसे सभी सर्वदा उनके अधीन और उन्हींके अनुशासनमें रहते हैं। कोई भी उनकी महिमाका पार नहीं पा सकता। वे सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥ ९ ॥
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
मृत्योः स मृत्युमाज्जोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥
यत् इह=जो परब्रह्म यहाँ (है); तत् एव अमुत्र=वही वहाँ (परलोकमें भी है); यत् अमुत्र=जो वहाँ (है); तत् अनु इह=वही यहाँ (इस लोकमें) भी है; सः मृत्योः=वह मनुष्य मृत्युसे; मृत्युम्=मृत्युको (अर्थात् बारंबार जन्म-मरणको); आज्जोति=प्राप्त होता है; यः=जो; इह=इस जगत्में; नाना इव=(उस परमात्माको) अनेककी भाँति; पश्यति=देखता है ॥ १० ॥
व्याख्या —जो सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर््यामी, सर्वरूप, सबके परम कारण, परब्रह्म पुरुषोत्तम यहाँ इस पृथ्वीलोकमें हैं, वही वहाँ परलोकमें अर्थात् देव-गन्धर्वदि विभिन्न अनन्त लोकोंमें भी हैं; तथा जो वहाँ हैं, वे ही यहाँ भी हैं। एक ही परमात्मा अखिल ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। जो उन एक ही परब्रह्मको लीलासे नाना नामों और रूपोंमें प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्वकी कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्युके अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म-मरणका चक्र सहज ही नहीं छूटता। अतः दृढ़तापूर्वक यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्तिके सहित नाना रूपोंमें