भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

वल्ल्बी ३ ]

कठोपनिषद्

१३१

सम्बन्ध—यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं—

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्था न प्रकाशते।

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

एषः आत्मा=यह सबका आत्मरूप परमपुरुष; सर्वेषु भूतेषु=समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी; गूढः=मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण; न प्रकाशते=सबके प्रत्यक्ष नहीं होता; तु सूक्ष्मदर्शिभिः=केवल सूक्ष्मतत्त्वोंको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही; सूक्ष्मया अग्र्यया बुद्ध्या=अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे; दृश्यते=देखा जाता है ॥ १२ ॥

व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान् सबके अन्तर्धामी हैं, अतः सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं, परंतु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमें नहीं आते। जिन्होंने भगवान्का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ १२ ॥

सम्बन्ध—विवेकशील मनुष्यको भगवान्के शरण होकर किस प्रकार भगवान्की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये?—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

यच्छेद्वाद्भुमन्सी प्राज्ञस्तद्यच्छेञ्ज्ञान आत्मनि।

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥

प्राज्ञः=बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि; वाक्=(पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को; मनसी=मनमें; यच्छेत्=निरुद्ध करे; तत्=उस मनको; ज्ञाने आत्मनि=ज्ञानस्वरूप बुद्धिमें; यच्छेत्=विलीन करे; ज्ञानम्=ज्ञानस्वरूप बुद्धिको; महति आत्मनि=महान् आत्मामें; नियच्छेत्=विलीन करे; (और); तत्=उसको; शान्ते आत्मनि=शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मामें; यच्छेत्=विलीन करे ॥ १३ ॥

व्याख्या—बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह पहले तो वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमें विषयोंकी स्फुरणा न

१३२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

रहे। जब यह साधन भलीभाँति होने लगे, तब मनको ज्ञानस्वरूप बुद्धिमें विलीन कर दे अर्थात् एकमात्र विज्ञानस्वरूप निश्चयात्मिका बुद्धिकी वृत्तिके सिवा मनकी भिन्न सत्ता न रहे, किसी प्रकारका अन्य कोई भी चिन्तन न रहे। जब यहाँतक दृढ़ अभ्यास हो जाय, तदनन्तर उस ज्ञानस्वरूपा बुद्धिको भी जीवात्माके शुद्ध स्वरूपमें विलीन कर दे। अर्थात् ऐसी स्थितिमें स्थित हो जाय, जहाँ एकमात्र आत्मतत्त्वके सिवा—अपनेसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता या स्मृति नहीं रह जाती। इसके पश्चात् अपने-आपको भी पूर्व निश्चयके अनुसार शान्त आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तममें विलीन कर दे॥ १३ ॥

सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके तथा उसकी प्राप्तििका महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्योंको सावधान करती हुई कहती है—

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरात्रिबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥

उत्तिष्ठत =(हे मनुष्यो!) उठो; जाग्रत =जागो (सावधान हो जाओ और); वरात्र प्राप्य =श्रेष्ठ महापुरुषोंको पाकर—उनके पास जाकर (उनके द्वारा); निबोधत =उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो (क्योंकि); कवयः =त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन; तत् पथः =उस तत्त्वज्ञानके मार्गको; क्षुरस्य =छूरेकी; निशिता दुरत्यया =तीक्ष्ण की हुई दुस्तर; धारा [इब]=धारके सद्गुण; दुर्गम् =दुर्गम (अत्यन्त कठिन); वदन्ति =बतलाते हैं॥ १४ ॥

व्याख्या— हे मनुष्यो! तुम जन्म-जन्मान्तरसे अज्ञाननिद्रामें सो रहे हो। अब तुम्हें परमात्माकी दयासे यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला है। इसे पाकर अब एक क्षण भी प्रमादमें मत खोओ। शीघ्र सावधान हो जाओ। श्रेष्ठ महापुरुषोंके पास जाकर उनके उपदेशद्वारा अपने कल्याणका मार्ग और परमात्माका रहस्य समझ लो। परमात्माका तत्त्व बड़ा गहन है; उसके स्वरूपका ज्ञान, उसकी प्राप्तििका मार्ग महापुरुषोंकी सहायता और परमात्माकी कृपाके बिना वैसा ही दुस्तर है, जिस प्रकार छूरेकी तेज धारपर चलना। ऐसे दुस्तर मार्गसे सुगमतापूर्वक पार

बल्ली ३ ]

कठोपनिषद्

१३३

होनेका सरल उपाय वे अनुभवी महापुरुष ही बता सकते हैं, जो स्वयं इसे पार कर चुके हैं ॥ १४ ॥

सम्बन्ध —ब्रह्मप्राप्तिका मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ? इस जिज्ञासापर परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसको जाननेका फल बतलाते हैं—

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं

तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।

अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं

निचाव्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥

यत्=जो; अशब्दम्=शब्दरहित; अस्पर्शम्=स्पर्शरहित; अरूपम्=रूपरहित; अरसम्=रसरहित; च=और; अगन्धवत्=बिना गन्धवाला है; तथा=तथा (जो); अव्ययम्=अविनाशी; नित्यम्=नित्य; अनादि=अनादि; अनन्तम्= अनन्त (असीम); महतः परम्=महान् आत्मासे श्रेष्ठ (एवं); ध्रुवम्=सर्वथा सत्य तत्त्व है; तत्=उस परमात्माको; निचाव्य=जानकर (मनुष्य); मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे; प्रमुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अविनाशी, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है ॥ १५ ॥

सम्बन्ध —यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं—

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तः सनातनम्।

उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥

मेधावी=बुद्धिमान् मनुष्य; मृत्युप्रोक्तम्=यमराजके द्वारा कहे हुए;

१३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

नाचिकेतम्=नचिकेताके; सनातनम्=(इस) सनातन; उपाख्यानम्=उपाख्यानका; उक्त्वा=वर्णन करके; =और; श्रुत्वा=श्रवण करके; ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें; महीयते=महिमान्वित होता है (प्रतिष्ठित होता है) ॥ १६ ॥

व्याख्या— यह जो इस अध्यायमें नचिकेताके प्रति यमराजका उपदेश है, यह कोई नयी बात नहीं है; यह परम्परागत सनातन उपाख्यान है। बुद्धिमान् मनुष्य इसका वर्णन और श्रवण करके ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठावाला होता है॥ १६॥

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते।
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥

यः=जो मनुष्य; प्रयतः=सर्वथा शुद्ध होकर; इमम्=इस; परमम् गुह्यम्=परम गुह्य—रहस्यमय प्रसङ्गको; ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामें; श्रावयेत्=सुनाता है; वा=अथवा; श्राद्धकाले=श्राद्धकालमें; [ श्रावयेत् ]=(भोजन करनेवालोंको) सुनाता है; तत्=(उसका) वह श्रवण करानारूप कर्म; आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमें (अविनाशी फल देनेमें) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमें समर्थ होता है॥ १७॥

व्याख्या— जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीसे इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामें सुनाता है अथवा श्राद्धकालमें भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसका वह वर्णनरूप कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है, अनन्त होनेमें समर्थ होता है। दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है॥ १७॥

॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

प्रथम वल्ली

**सम्बन्ध—**तृतीय वल्लीमें यह बतलाया गया कि वे परब्रह्म परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्तमान हैं, परंतु सबको दीखते नहीं। कोई विरला ही उन्हें सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा देख सकता है। इसपर यह प्रश्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदयमें हैं तब उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूप नेत्रोंद्वारा क्यों नहीं देख लेते? कोई विरला ही क्यों देखता है? इसपर कहते हैं—

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-
स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

स्वयम्भूः=स्वयं प्रकट होनेवाले परमेश्वरने; खानि=समस्त इन्द्रियोंके द्वार; पराञ्चि=बाहरकी ओर जानेवाले ही; व्यतृणत्=बनाये हैं; तस्मात्=इसलिये (मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा प्रायः); पराङ्=बाहरकी वस्तुओंको ही; पश्यति=देखता है; अन्तरात्मन्=अन्तरात्माको; =नहीं; कश्चित् धीरः=किसी (भाग्यशाली) बुद्धिमान् मनुष्यने ही; अमृतत्वम्=अमर पदको; इच्छन्=पानेकी इच्छा करके; आवृत्तचक्षुः=चक्षु आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंकी ओरसे लौटाकर; प्रत्यगात्मानम्=अन्तरात्माको; ऐक्षत्=देखा है॥ १॥

**व्याख्या—**शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध—इन्द्रियोंके ये सभी स्थूल विषय बाहर हैं। इसका यथार्थ ज्ञान करानेके लिये इन्द्रियोंकी रचना हुई है; क्योंकि इनका ज्ञान हुए बिना न तो मनुष्य किसी विषयके स्वरूप और गुणको ही जान सकता है और न उसका यथायोग्य त्याग एवं ग्रहण करके भगवान्‌के इन्द्रिय-

१३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २

निर्माणके उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये उनके द्वारा नवीन शुभकर्मोंका सम्पादन ही कर सकता है। इन्द्रिय-निर्माण इसीलिये है कि मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा स्वास्थ्यकर, सुबुद्धिदायक, विशुद्ध विषयोंका ग्रहण करके सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर हो। इसीलिये स्वयंभूभगवान्‌ने इन्द्रियोंका मुख बाहरकी ओर बनाया, परंतु विवेकके अभावसे अधिकांश मनुष्य इस बातको नहीं जानते और विषयासक्तिवश उन्मत्तकी भाँति आपातखमणीय परिणाममें भगवान्‌से हटाकर दुःखशोकमय नरकोंमें पहुँचानेवाले अशुद्ध विषयभोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। वे अन्तर्यामी परमात्माकी ओर देखते ही नहीं। कोई विरला ही बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होता है जो सत्सङ्ग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपासे अशुद्ध विषयभोगोंकी परिणामदुःखताको जानकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे लौटाकर, उन्हें भगवत्सम्बन्धी विषयोंमें लगाकर अन्तरात्माको—अन्तर्यामी परमात्माको देखता है॥ १॥

पराचः कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥

[ ये ] बालाः=जो मूर्ख; पराचः कामान्=बाह्य भोगोंका; अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं (उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं); ते=वे; विततस्य=सर्वत्र फैले हुए; मृत्योः=मृत्युके; पाशम्=बन्धनमें; यन्ति=पड़ते हैं; अथ=किंतु; धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य; ध्रुवम्=नित्य; अमृतत्वम्=अमरपदको; विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर; इह=इस जगत्में; अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको (भी); न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते ॥ २॥

व्याख्या— जो बाह्य विषयोंकी चमक-दमक और आपातरमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एवं अमूल्य मनुष्य-जीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे

वल्ली १ ]

कठोपनिषद्

१३७

सर्वकालव्यापी मृत्युके पाशमें बँध जाते हैं, दीर्घकालतक नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म धारण करके बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं, परंतु जो बुद्धिमान् हैं, वे इस विषयपर गहराईसे यों विचार करते हैं कि ये इन्द्रियोंके भोग तो जीवको दूसरी योनियोंमें भी पर्याप्त मिल सकते हैं। मनुष्य-शरीर उन सबसे विलक्षण है। इसका वास्तविक उद्देश्य विषयोपभोग कभी नहीं हो सकता। इस प्रकार विचार करनेपर जब यह बात उनकी समझमें आ जाती है कि इसका उद्देश्य अमृतस्वरूप नित्य परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करना है और वह इसी शरीरमें प्राप्त किया जा सकता है, तब वे सर्वतोभावे उसीकी ओर लग जाते हैं। फिर वे इस विनाशशील जगत्में क्षणभङ्गुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करते, इनसे सर्वथा विरक्त होकर सावधानीके साथ परमार्थ-साधनमें लग जाते हैं ॥ २ ॥

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्सपर्शाःश्र श्र मैथुनान् ।

एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ ३ ॥

येन=जिसके अनुग्रहसे (मनुष्य); शब्दान्=शब्दोंको; स्पर्शान्=स्पर्शोंको; रूपम्=रूप-समुदायको; रसम्=रस-समुदायको; गन्धम्=गन्धसमुदायको; च=और; मैथुनान्=स्त्री-प्रसंग आदिके सुखोंको; विजानाति=अनुभव करता है; एतेन एव=इसीके अनुग्रहसे (यह भी जानता है कि); अत्र किम्=यहाँ क्या; परिशिष्यते=शेष रह जाता है; एतत् वै=यह ही है; तत्=वह परमात्मा (जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ३ ॥

व्याख्या—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक सब प्रकारके विषयोंका और स्त्री-सहवासादिसे होनेवाले सुखोंका मनुष्य जिस परम देवसे मिली हुई ज्ञानशक्तिके द्वारा अनुभव करता है, उन्हींकी दी हुई शक्तिके इनकी क्षणभङ्गुरताको देखकर वह यह भी समझ सकता है कि इन सबमेंसे ऐसी कौन वस्तु है, जो यहाँ शेष रहेगी? विचार करनेपर यही समझमें आता है कि ये सभी पदार्थ प्रतिक्षण बदलनेवाले होनेसे विनाशशील हैं। इन सबके परम कारण एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही नित्य हैं। वे पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे। अतः हे

१३८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

नचिकेता! तुम्हारा पूछा हुआ वह ब्रह्मतत्त्व यही है, जो सबका शेणी है, सबका पर्यवसान है, सबकी अवधि और सबकी परम गति है॥ ३ ॥

स्वज्ज्ञानं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ ४ ॥

स्वज्ज्ञानम् च=स्वप्नके दृश्योंको और; जागरितान्तम्=जाग्रत्-अवस्थाके दृश्योंको; उभौ=इन दोनों अवस्थाओंके दृश्योंको (मनुष्य); येन=जिससे; अनुपश्यति=बार-बार देखता है; [ तम् ]=उस; महान्तम्=सर्वश्रेष्ठ; विभुम्=सर्वव्यापी; आत्मानम्=सबके आत्माको; मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य; न शोचति=शोक नहीं करता॥ ४ ॥

व्याख्या —जिस परमात्माके सहयोगसे यह जीवात्मा स्वप्नमें और जगत्में होनेवाली समस्त घटनाओंका बारंबार अनुभव करता रहता है, इन सबको जाननेकी शक्ति इसको जिस परब्रह्म परमेश्वरसे मिली है, जिसकी कृपासे इस जीवको उस (परमात्मा)-की विज्ञानशक्तिका एक अंश प्राप्त हुआ है, उस सबकी अपेक्षा महान् सदा-सर्वदा सर्वत्र व्याप्त परब्रह्म परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता॥ ४ ॥

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते॥ एतद्वै तत्॥ ५ ॥

यः=जो मनुष्य; मध्वदम्=कर्मफलदाता; जीवम्*=सबको जीवन प्रदान करनेवाले; (तथा) भूतभव्यस्य=भूत, (वर्तमान) और भविष्यका; ईशानम्=शासन करनेवाले; इमम्=इस; आत्मानम्=परमात्माको; अन्तिकात् वेद=(अपने) समीप जानता है; ततः [ सः ]=उसके बाद वह; न विजुगुप्सते=(कभी) किसीकी निन्दा

  • यहाँ 'जीव' शब्द परमात्माके लिये ही प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि भूत, भविष्य और वर्तमानका शासक जीव नहीं हो सकता। प्रकरण भी यहाँ परमात्माका है, जीवका नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र १।३।२४ का शाङ्करभाष्य)।

बल्ली १ ]

कठोपनिषद्

१३९

नहीं करता; एतत् वै=यह ही (है); तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ५ ॥

व्याख्या —जो साधक सबको जीवन प्रदान करनेवाले, जीवोंके परम जीवन और उन्हें उनके कर्मोंका फल भुगतानेवाले तथा भूत, वर्तमान और भावी जगत्का एकमात्र शासन करनेवाले उस परब्रह्म परमेश्वरको इस प्रकार समझ लेता है कि 'वह अन्तर्यामीरूपसे निरन्तर मेरे समीप मेरे हृदयमें ही स्थित है और इससे स्वाभाविक ही यह अनुमान कर लेता है कि इसी प्रकार वे सर्वनियन्ता परमात्मा सबके हृदयमें स्थित हैं, वह फिर उनके इस महिमाय स्वरूपको कभी नहीं भूल सकता। इसलिये वह कभी किसीकी निन्दा नहीं करता, किसीसे भी घृणा या द्वेष नहीं करता। नचिकेता! तुमने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था, वह यही है, जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है ॥ ५ ॥

सम्बन्ध —अब यह बतलाते हैं कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही उत्पन्न हुए हैं; अतः जो कुछ भी है, सब उन्हींका रूपविशेष है। उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत्के अभिन्ननिमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपोंमें स्थित हैं।

यः पूर्व तपसो जातमदभ्यः पूर्वमजायत।

गृहो प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेर्भिव्यपश्यत् ॥ एतद्वै तत् ॥ ६ ॥

यः =जो; अदभ्यः =जलसे; पूर्वम् =पहले; अजायत =हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; [ तम् ] =उस; पूर्वम् =सबसे पहले; तपसः जातम् =तपसे उत्पन्न; गृहाम् प्रविश्य =हृदय-गुफामें प्रवेश करके; भूतेर्भिः [ सह ] =जीवात्माओंके साथ; तिष्ठन्तम् =स्थित रहनेवाले परमेश्वरको; यः =जो पुरुष; व्यपश्यत् =देखता है (वही ठीक देखता है); एतत् वै =यह ही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ६ ॥

व्याख्या —जो जलसे उपलक्षित पाँचों महाभूतोंसे पहले हिरण्यगर्भ ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुए थे, उन अपने ही संकल्परूप तपसे प्रकट होनेवाले और सब जीवोंके हृदयरूप गुफामें प्रविष्ट होकर उनके साथ रहनेवाले परमेश्वरको

१४०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

जो इस प्रकार जानता है कि 'सबके हृदयमें निवास करनेवाले सबके अन्तर्यामी परमेश्वर एक ही हैं, यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींकी महिमाका प्रकाश करता है, वही यथार्थ जानता है। वे सदा सबके हृदयमें रहनेवाले ही ये तुम्हारे पूछे हुए परब्रह्म परमेश्वर हैं॥६॥

सम्बन्ध— उन्हीं परब्रह्मका अब अदितिदेवीके रूपसे वर्णन करते हैं—

या प्राणेन सम्भवत्यदितिदैवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिव्यंजायत ॥ एतद्वै तत् ॥७॥

या=जो; देवतामयी=देवतामयी; अदिति=अदिति; प्राणेन=प्राणोंके सहित; सम्भवति=उत्पन्न होती है; या=जो; भूतेभिः=प्राणियोंके सहित; व्यंजायत=उत्पन्न हुई है; (तथा जो) गुहाम्=हृदयरूपी गुफामें; प्रविश्य=प्रवेश करके; तिष्ठन्तीम्=वहीं रहनेवाली है उसे; (जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है,) एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था)॥७॥

व्याख्या— जो सर्वदेवतामयी भगवती अदितिदेवी पहले-पहल उस पर-ब्रह्मके संकल्पसे सब जगत्की जीवनी शक्तिके सहित उत्पन्न होती है तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंको बीजरूपसे अपने साथ लेकर प्रकट हुई थी। हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट होकर वहीं रहनेवाली वह भगवती—भगवान्की अचिन्त्यमहाशक्ति भगवान्से सर्वथा अभिन्न है, भगवान् और उनकी शक्तिमें कोई भेद नहीं है, भगवान् ही शक्तिरूपसे सबके हृदयमें प्रवेश किये हुए हैं। हे नचिकेता! वे ही ये ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था।

अथवा—जननीरूपमें समस्त देवताओंका सृजन करनेवाली होनेके कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूहका अदन—भक्षण करनेवाली होनेसे भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणोंके सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियोंके साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियोंकी हृदय-गुफामें प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वरकी महाशक्ति वस्तुतः उनका प्रतीक ही हैं। स्वयं परमेश्वर ही इस

बल्ली १ ]

कठोपनिषद्

१४१

रूपमें अपनेको प्रकट करते हैं। ये ही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें नचिकेता! तुमने पूछा था ॥७॥

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभूतौ गर्भिणीभिः ।

दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्विष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः * ॥

एतद्वै तत् ॥८॥

[ यः ]=जो; जातवेदाः=सर्वज्ञ; अग्निः=अग्निदेवता; गर्भिणीभिः=गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा; सुभूतः=भली प्रकार धारण किये हुए; गर्भः=गर्भकी; इव=भाँति; अरण्योः=दो अरण्योंमें; निहितः=सुरक्षित है—छिपा है (तथा जो); जागृवद्भिः=सावधान (और); हविष्मद्भिः=हवन करनेयोग्य सामग्रियोंसे युक्त; मनुष्येभिः=मनुष्योंद्वारा, दिवे दिवे=प्रतिदिन; ईड्यः=स्तुति करनेयोग्य (है); एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥८॥

व्याख्या—जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रीके द्वारा धारण किया हुआ शुद्ध अन्न-पानादिसे परिपुष्ट बालक गर्भमें छिपा रहता है, उसी प्रकार जो सर्वज्ञ अग्निदेवता अंधर और उत्तर अरणि (ऊपर-नीचेके काछखण्ड)-के भीतर छिपे हुए हैं तथा अग्निविद्याके जाननेवाले, प्रयत्नशील, सावधान, श्रद्धालु, सब प्रकारकी आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्यगण प्रतिदिन जिनकी स्तुति और आदर किया करते हैं, वे अग्निदेवता सर्वज्ञ परमेश्वरके ही प्रतीक हैं। नचिकेता! ये ही वे तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥८॥

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।

तं देवाः सर्वे अपितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥ ९ ॥†

यतः=जहाँसे; सूर्यः=सूर्यदेव; उदेति=उदय होते हैं; च=और; यत्र=जहाँ; अस्तम् च=अस्तभावको भी; गच्छति=प्राप्त होते हैं; सर्वे=सभी; देवाः=देवता;

  • यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल ३ सू० २९।२) में और सामवेद (पूर्वाचिक खण्ड ८।७) में भी है।

† अथर्ववेद १०।८।१९।

१४२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

तम्=उसीमें; अर्पिता:=समर्पित हैं; तत् उ=उस परमेश्वरको; कश्चन=कोई (कभी भी); न अत्येति=नहीं लाँध सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ९ ॥

व्याख्या —जिन परमेश्वरसे सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमामें ही यह सूर्यदेवताकी उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है; उन परब्रह्ममें ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं—सब उन्हींमें ठहरे हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है जो उन सर्वोत्कृष्ट, सर्वमय, सबके आदि, अन्त आश्रयस्थल परमेश्वरकी महिमा और व्यवस्थाका उल्लङ्घन कर सके। सर्वतोभावसे सभी सर्वदा उनके अधीन और उन्हींके अनुशासनमें रहते हैं। कोई भी उनकी महिमाका पार नहीं पा सकता। वे सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥ ९ ॥

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।

मृत्योः स मृत्युमाज्जोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥

यत् इह=जो परब्रह्म यहाँ (है); तत् एव अमुत्र=वही वहाँ (परलोकमें भी है); यत् अमुत्र=जो वहाँ (है); तत् अनु इह=वही यहाँ (इस लोकमें) भी है; सः मृत्योः=वह मनुष्य मृत्युसे; मृत्युम्=मृत्युको (अर्थात् बारंबार जन्म-मरणको); आज्जोति=प्राप्त होता है; यः=जो; इह=इस जगत्में; नाना इव=(उस परमात्माको) अनेककी भाँति; पश्यति=देखता है ॥ १० ॥

व्याख्या —जो सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर््यामी, सर्वरूप, सबके परम कारण, परब्रह्म पुरुषोत्तम यहाँ इस पृथ्वीलोकमें हैं, वही वहाँ परलोकमें अर्थात् देव-गन्धर्वदि विभिन्न अनन्त लोकोंमें भी हैं; तथा जो वहाँ हैं, वे ही यहाँ भी हैं। एक ही परमात्मा अखिल ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। जो उन एक ही परब्रह्मको लीलासे नाना नामों और रूपोंमें प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्वकी कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्युके अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म-मरणका चक्र सहज ही नहीं छूटता। अतः दृढ़तापूर्वक यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्तिके सहित नाना रूपोंमें

वल्ल्नी १ ]

कठोपनिषद्

१४३

प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मासे ही व्याप्त होनेके कारण उन्हींका स्वरूप है ॥१०॥

मनसैवेदमासव्यं नेह नानास्ति किञ्चन। मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥११॥

मनसा एव=(शुद्ध) मनसे ही; इदम् आत्मव्यम्=यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जानेयोग्य है; इह=इस जगत्में (एक परमात्माके अतिरिक्त); नाना=नाना (भिन्न-भिन्न भाव); किञ्चन=कुछ भी; न अस्ति=नहीं है; (इसलिये) यः इह=जो इस जगत्में; नाना इव=नानाकी भाँति; पश्यति=देखता है; सः=वह मनुष्य; मृत्योः=मृत्युसे; मृत्युम् गच्छति=मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥११॥

व्याख्या—परमात्माका परमतत्त्व शुद्ध मनसे ही इस प्रकार जाना जा सकता है कि इस जगत्में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। यहाँ परमात्मासे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नताकी झलक देखता है, वह मनुष्य मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥११॥

अङ्गुमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ एतद्वै तत् ॥१२॥

अङ्गुमात्रः=अङ्गुमात्र (परिमाणवाला); पुरुषः=परम पुरुष (परमात्मा); आत्मनि मध्ये=शरीरके मध्यभाग—हृदयाकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; भूतभव्यस्य=जो कि भूत, (वर्तमान) और भविष्यका; ईशानः=शासन करनेवाला (है); ततः=उसे जान लेनेके बाद (वह); न विजुगुप्सते=किसीकी भी निन्दा नहीं करता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥१२॥

व्याख्या—यद्यपि अन्तर्यामी परमेश्वर जो कि भूत, वर्तमान और भविष्यमें होनेवाले सभी प्राणियोंके शासक हैं, समानभावसे सर्वदा सर्वत्र परिपूर्ण हैं, तथापि हृदयमें उनका विशेष स्थान माना गया है। परमेश्वर किसी स्थूल, सूक्ष्म आकार-

१४४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

विशेषवाले नहीं हैं, परंतु स्थितिके अनुसार वे सभी आकारोंसे सम्पन्न हैं। क्षुद्र चींटीके हृदयदेशमें वे चींटीके हृदयपरिमाणके अनुसार परिमाणवाले हैं और विशालकाय हाथीके हृदयमें उसके हृदय-परिमाणवाले बनकर विराजित हैं। मनुष्यका हृदय अङ्गुष्ठ-परिमाणका है और मनुष्य ही परमात्माकी प्रासिका अधिकारी माना गया है। अतः मनुष्यका हृदय ही परब्रह्म परमेश्वरकी उपलब्धिका स्थान समझा जाता है। इसलिये यहाँ मनुष्यके हृदय-परिमाणके अनुसार परमेश्वरको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणका कहा गया है। इस प्रकार परमेश्वरको अपने हृदयमें स्थित देखनेवाला स्वाभाविक ही यह जानता है कि इसी भाँति वे सबके हृदयमें स्थित हैं; अतएव फिर किसीकी निन्दा नहीं करता एवं न किसीसे घृणा या द्वेष ही करता है। नचिकेता! यही वह ब्रह्म है, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ॥ १२ ॥

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।

ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ एतद्वै तत् ॥ १३ ॥

अङ्गुष्ठमात्रः =अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुषः =परमपुरुष परमात्मा; अधूमकः =धूम्ररहित; ज्योतिः =इव=ज्योतिकी भाँति है; भूतभव्यस्य =भूत, (वर्तमान और) भविष्यपर; ईशानः =शासन करनेवाला; सः एव अद्य =वह परमात्मा ही आज है; उ=और; सः [ एव ] श्वः =वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य सनातन है); एतत् वै =वही है; तत् =वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥

व्याख्या —मनुष्यकी हृदयगुफामें स्थित ये अङ्गुष्ठमात्र पुरुष भूत, भविष्य और वर्तमानका नियन्त्रण करनेवाले स्वतन्त्र शासक हैं। ये ज्योतिर्मय हैं। सूर्य, अग्निकी भाँति उष्ण प्रकाशवाले नहीं; परंतु दिव्य, निर्मल और शान्त प्रकाशस्वरूप हैं। लौकिक ज्योतियोंमें धूम्ररूप दोष होता है; ये धूम्ररहित, दोषरहित, सर्वथा विशुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। अन्य ज्योतियाँ घटती-बढ़ती हैं और समयपर बुझ जाती हैं; परंतु ये जैसे आज हैं, वैसे ही कल भी हैं। इनकी

वल्ल्बी १ ]

कठोपनिषद्

१४५

एकरसता नित्य अशुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढ़ते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था*॥ १३॥

यथोदकं दुर्गं वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान् पृथक् पश्यन्तानेवानुविधावति॥ १४॥

यथा=जिस प्रकार; दुर्गं=ऊँचे शिखरपर; वृष्टम्=बरसा हुआ; उदकम्=जल; पर्वतेषु=पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति=चारों ओर चला जाता है; एवम्=उसी प्रकार; धर्मान्=भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिकों; पृथक्=परमात्मासे पृथक्, पश्यन्=देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव=उन्हींके; अनुविधावति=पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमें और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है)॥ १४॥

व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरंत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करके पर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे उत्पन्न हुए विभिन्न स्वभाववाले देव-असुर-मनुष्यादिकों जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनकी उपासना, पूजा आदि करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एवं नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकना पड़ता है (गीता ९। २३—२५)। वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता॥ १४॥

  • यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रातःस्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है—'परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमितः पुरुषो भवितुमर्हति। कस्मात्? शब्दात्—'ईशानो भूतभ्यस्य' इति। न ह्यन्यः परमेश्वराद् भूतभ्यस्य निरङ्गुष्ठीमाशिता।' अर्थात् यहा अङ्गुष्ठमात्र परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्गुष्ठ नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता (देखिये ब्रह्मसूत्र १। ३। २४) का शाङ्करभाष्य। यह बात उस प्रकरणके मूल सूत्रोंमें भी स्पष्ट है।

१४६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिकं तादृगेव भवति। एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥

यथा=(परंतु) जिस प्रकार; शुद्धे [ उदके ]=निर्मल जलमें; आसिक्तम्=(मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ; शुद्धम्=निर्मल; उदकम्=जल; तादृक् एव=वैसा ही; भवति=हो जाता है; एवम्=उसी प्रकार; गौतम=हे गौतमवंशी नचिकेता; विजानत:=(एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले; मुनेः=मुनिका (संसारसे उपरत हुए महापुरुषका); आत्मा=आत्मा; भवति=(ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥

व्याख्या—परंतु यही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥

प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४)

द्वितीय वल्ली

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्टाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥

अवक्रचेतसः=सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप; अजस्य=अजन्मा परमेश्वरका; एकादशद्वारम्=ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य-शरीररूप); पुरम्=पुर (नगर); [अस्ति]=है (इसके रहते हुए ही); अनुष्टाय=(परमेश्वरका ध्यान आदि) साधन करके; न शोचति=(मनुष्य) कभी शोक नहीं करता; च=अपि तु; विमुक्तः=जीवन्युक्त

वल्ली २ ]

कठोपनिषद्

१४७

होकर; विमुच्यते=(मरनेके बाद) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै=वही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥

व्याख्या —वह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न—इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य, निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदासे परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्य-शरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्य-शरीरके रहते हुए ही—जीते-जी जो मनुष्य भजन-स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता, वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवनमुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है—परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥

सम्बन्ध —अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्मृष्टीकरण करते हैं—

हंसःशुचिषद्वसुन्तरिक्षस-
द्भोतावेदिषदतिथिदुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा
गोजाऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् * ॥ २ ॥

शुचिषत्=जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः=स्वयं प्रकाश (पुरुषोत्तम) है (वही); अन्तरिक्षसत्=अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला; वसुः=वसु है; दुरोणसत्=घरोंमें उपस्थित होनेवाला; अतिथिः=अतिथि है (और); वेदिषत् होता=यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निस्वरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा); नृषत्=समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला; वरसत्=मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला;

  • यह मन्त्र यजुर्वेद १०। २४, १२। १४ और ऋग्वेद ४। ४०। ५ में है।

१४८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २

ऋतसत्=सत्यमें रहनेवाला (और); व्योमसत्=आकाशमें रहनेवाला (है तथा); अब्जाः=जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; गोजाः=पृथिवीमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; ऋतजाः=सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः=पर्वतोंमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाला (है); बृहत् ऋतम्=(वही) सबसे बड़ा परम सत्य है॥ २॥

**व्याख्या—**जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयं प्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वे ही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं; वे ही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले ‘होता’ हैं, वे ही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं; मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं; वे ही जलोंमें मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं; पृथिवीमें वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमें प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं॥ २॥

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥ ३॥

प्राणम्=(जो) प्राणको; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; उन्नयति=उठाता है (और); अपानम्=अपानको; प्रत्यक् अस्यति=नीचे ढकेलता है; मध्ये=शरीरके मध्य (हृदय) में; आसीनम्=बैठे हुए (उस); वामनम्=सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी; विश्वे देवाः=सभी देवता; उपासते=उपासना करते हैं॥ ३॥

**व्याख्या—**शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव-हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढ़ा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल

वल्ली २ ] कठोपनिषद् १४१

रहे हैं। इस प्रकार वे शरीरके अंदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारूरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण, मन, बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृदेवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं॥ ३॥

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ ४ ॥

अस्य= इस; शरीरस्थस्य= शरीरमें स्थित; विस्रंसमानस्य= एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले; देहिनः= जीवात्माके; देहात्= शरीरसे; विमुच्यमानस्य= निकल जानेपर; अत्र= यहाँ (इस शरीरमें) किम् परिशिष्यते= क्या शेष रहता है; एतत् वै= यही है; तत्= वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ४ ॥

व्याख्या— यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत-शरीरमें क्या बच रहता है। देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता; पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था॥ ४॥

सम्बन्ध— अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वको पुनः दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥

कश्चन= कोई भी; मर्त्यः= मरणधर्मा प्राणी; न प्राणेन= न तो प्राणसे (जीता

१५०ईशादि नौ उपनिषद्[ अध्याय २

है और); न अपानेन=न अपानसे (ही); जीवति=जीता है; तु=किंतु; यस्मिन्=जिसमें; एतौ उपाश्रितौ=(प्राण और अपान) ये दोनों आश्रय पाये हुए हैं; इतरेण=(ऐसे किसी) दूसरेसे ही; जीवन्ति=(सब) जीते हैं; गौतम=हे गौतमवंशीय; गुह्यम् सनातनम्=(वह) रहस्यमय सनातन; ब्रह्म=ब्रह्म (जैसा है); =और; आत्मा=जीवात्मा; मरणम् प्राप्य=मरकर; यथा=जिस प्रकारसे; भवति=रहता है; इदम् ते=यह बात तुम्हें; हन्त प्रवक्ष्यामि=मैं अब फिरसे बतलाऊँगा ॥ ५-६ ॥

व्याख्या— यमराज कहते हैं—नचिकेता! एक दिन निश्चय ही मृत्युके मुखमें जानेवाले ये मनुष्यादि प्राणी न तो प्राणकी शक्तिसे जीवित रहते हैं और न अपानकी शक्तिसे ही। इन्हें जीवित रखनेवाला तो कोई दूसरा ही चेतन तत्त्व है और वह है जीवात्मा। ये प्राण-अपान दोनों उस जीवात्माके ही आश्रित हैं। जीवात्माके बिना एक क्षण भी ये नहीं रह सकते; जब जीवात्मा जाता है, तब केवल ये ही नहीं, इन्हींके साथ इन्द्रियादि सभी उसका अनुसरण करते हुए चले जाते हैं। (गीता १५। ८, ९) अब मैं तुमको यह बतलाऊँगा कि मनुष्यके मरनेके बाद इस जीवात्माका क्या होता है, यह कहाँ जाता है तथा किस प्रकार रहता है और साथ ही यह भी बतलाऊँगा कि उस परम रहस्यमय सर्वव्यापी सर्वाधार सर्वाधिपति परब्रह्म परमेश्वरका क्या स्वरूप है ॥ ५-६ ॥

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥ ७॥

यथाकर्म=जिसका जैसा कर्म होता है; यथाश्रुतम्=और शास्त्रादिके श्रवणद्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्हींके अनुसार); शरीरत्वाय=शरीर धारण करनेके लिये; अन्ये=कितने ही; देहिनः=जीवात्मा तो; योनिम्=(नाना प्रकारकी जङ्गम) योनियोंको; प्रपद्यन्ते=प्राप्त हो जाते हैं (और); अन्ये=दूसरे (कितने ही); स्थाणुम्=स्थाणु (स्थावर) भावका; अनुसंयन्ति=अनुसरण करते हैं ॥ ७ ॥

व्याख्या— यमराज कहते हैं कि अपने-अपने शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय आदिके द्वारा देखे-सुने हुए भावोंसे