ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २
ऋतसत्=सत्यमें रहनेवाला (और); व्योमसत्=आकाशमें रहनेवाला (है तथा); अब्जाः=जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; गोजाः=पृथिवीमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; ऋतजाः=सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः=पर्वतोंमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाला (है); बृहत् ऋतम्=(वही) सबसे बड़ा परम सत्य है॥ २॥
**व्याख्या—**जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयं प्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वे ही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं; वे ही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले ‘होता’ हैं, वे ही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं; मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं; वे ही जलोंमें मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं; पृथिवीमें वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमें प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं॥ २॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥ ३॥
प्राणम्=(जो) प्राणको; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; उन्नयति=उठाता है (और); अपानम्=अपानको; प्रत्यक् अस्यति=नीचे ढकेलता है; मध्ये=शरीरके मध्य (हृदय) में; आसीनम्=बैठे हुए (उस); वामनम्=सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी; विश्वे देवाः=सभी देवता; उपासते=उपासना करते हैं॥ ३॥
**व्याख्या—**शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव-हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढ़ा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल