ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१४८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २
ऋतसत्=सत्यमें रहनेवाला (और); व्योमसत्=आकाशमें रहनेवाला (है तथा); अब्जाः=जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; गोजाः=पृथिवीमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला; ऋतजाः=सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः=पर्वतोंमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाला (है); बृहत् ऋतम्=(वही) सबसे बड़ा परम सत्य है॥ २॥
**व्याख्या—**जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयं प्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वे ही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं; वे ही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले ‘होता’ हैं, वे ही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं; मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं; वे ही जलोंमें मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं; पृथिवीमें वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमें प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं॥ २॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥ ३॥
प्राणम्=(जो) प्राणको; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; उन्नयति=उठाता है (और); अपानम्=अपानको; प्रत्यक् अस्यति=नीचे ढकेलता है; मध्ये=शरीरके मध्य (हृदय) में; आसीनम्=बैठे हुए (उस); वामनम्=सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी; विश्वे देवाः=सभी देवता; उपासते=उपासना करते हैं॥ ३॥
**व्याख्या—**शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव-हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढ़ा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १४१
रहे हैं। इस प्रकार वे शरीरके अंदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारूरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण, मन, बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृदेवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं॥ ३॥
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ ४ ॥
अस्य= इस; शरीरस्थस्य= शरीरमें स्थित; विस्रंसमानस्य= एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले; देहिनः= जीवात्माके; देहात्= शरीरसे; विमुच्यमानस्य= निकल जानेपर; अत्र= यहाँ (इस शरीरमें) किम् परिशिष्यते= क्या शेष रहता है; एतत् वै= यही है; तत्= वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ४ ॥
व्याख्या— यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत-शरीरमें क्या बच रहता है। देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता; पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था॥ ४॥
सम्बन्ध— अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वको पुनः दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥
कश्चन= कोई भी; मर्त्यः= मरणधर्मा प्राणी; न प्राणेन= न तो प्राणसे (जीता
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है और); न अपानेन=न अपानसे (ही); जीवति=जीता है; तु=किंतु; यस्मिन्=जिसमें; एतौ उपाश्रितौ=(प्राण और अपान) ये दोनों आश्रय पाये हुए हैं; इतरेण=(ऐसे किसी) दूसरेसे ही; जीवन्ति=(सब) जीते हैं; गौतम=हे गौतमवंशीय; गुह्यम् सनातनम्=(वह) रहस्यमय सनातन; ब्रह्म=ब्रह्म (जैसा है); च=और; आत्मा=जीवात्मा; मरणम् प्राप्य=मरकर; यथा=जिस प्रकारसे; भवति=रहता है; इदम् ते=यह बात तुम्हें; हन्त प्रवक्ष्यामि=मैं अब फिरसे बतलाऊँगा ॥ ५-६ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं—नचिकेता! एक दिन निश्चय ही मृत्युके मुखमें जानेवाले ये मनुष्यादि प्राणी न तो प्राणकी शक्तिसे जीवित रहते हैं और न अपानकी शक्तिसे ही। इन्हें जीवित रखनेवाला तो कोई दूसरा ही चेतन तत्त्व है और वह है जीवात्मा। ये प्राण-अपान दोनों उस जीवात्माके ही आश्रित हैं। जीवात्माके बिना एक क्षण भी ये नहीं रह सकते; जब जीवात्मा जाता है, तब केवल ये ही नहीं, इन्हींके साथ इन्द्रियादि सभी उसका अनुसरण करते हुए चले जाते हैं। (गीता १५। ८, ९) अब मैं तुमको यह बतलाऊँगा कि मनुष्यके मरनेके बाद इस जीवात्माका क्या होता है, यह कहाँ जाता है तथा किस प्रकार रहता है और साथ ही यह भी बतलाऊँगा कि उस परम रहस्यमय सर्वव्यापी सर्वाधार सर्वाधिपति परब्रह्म परमेश्वरका क्या स्वरूप है ॥ ५-६ ॥
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥ ७॥
यथाकर्म=जिसका जैसा कर्म होता है; यथाश्रुतम्=और शास्त्रादिके श्रवणद्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्हींके अनुसार); शरीरत्वाय=शरीर धारण करनेके लिये; अन्ये=कितने ही; देहिनः=जीवात्मा तो; योनिम्=(नाना प्रकारकी जङ्गम) योनियोंको; प्रपद्यन्ते=प्राप्त हो जाते हैं (और); अन्ये=दूसरे (कितने ही); स्थाणुम्=स्थाणु (स्थावर) भावका; अनुसंयन्ति=अनुसरण करते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं कि अपने-अपने शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय आदिके द्वारा देखे-सुने हुए भावोंसे
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १५१
निर्मित अन्तःकालीन वासनाके अनुसार मरनेके पश्चात् कितने ही जीवात्मा तो दूसरा शरीर धारण करनेके लिये वीर्यके साथ माताकी योनिमें प्रवेश कर जाते हैं। इनमें जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्यका और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु-पक्षीका शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं और कितने ही, जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, स्थावरभावको प्राप्त होते हैं अर्थात् वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि जड शरीरमें उत्पन्न होते हैं॥ ७ ॥
**सम्बन्ध—**यमराजने जीवात्माकी गति और परमात्माका स्वरूप—इन दो बातोंको बतलानेकी प्रतिज्ञा की थी; इनमें मरनेके बाद जीवात्माकी क्या गति होती है, इसको बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं—
य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन।
एतद् वै तत्॥ ८॥
**यः एषः=**जो यह; कामम् कामम्=(जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकारके भोगोंका; **निर्मिमाणः=**निर्माण करनेवाला; **पुरुषः=**परमपुरुष परमेश्वर; सुप्तेषु=(प्रलयकालमें सबके) सो जानेपर भी; **जागर्ति=**जागता रहता है; **तत् एव=**वही; **शुक्रम्=**परम विशुद्ध तत्त्व है; **तत् ब्रह्म=**वही ब्रह्म है; **तत् एव=**वही; **अमृतम्=**अमृत; **उच्यते=**कहलाता है; (तथा) **तस्मिन्=**उसीमें; **सर्वे=**सम्पूर्ण; **लोकाः श्रिताः=**लोक आश्रय पाये हुए हैं; **तत् कश्चन उ=**उसे कोई भी; **न अत्येति=**अतिक्रमण नहीं कर सकता; **एतत् वै=**यही है; **तत्=**वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ८ ॥
**व्याख्या—**जीवात्माओंके कर्मानुसार उनके लिये नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला तथा उनकी यथायोग्य व्यवस्था करनेवाला जो यह परमपुरुष परमेश्वर समस्त जीवोंके सो जानेपर अर्थात् प्रलयकालमें सबका ज्ञान लुप्त हो जानेपर भी अपनी महिमामें नित्य जागता रहता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप है,
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जिसका ज्ञान सदैव एकरस रहता है, कभी अधिक, न्यून या लुप्त नहीं होता, वही परम विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही परब्रह्म है; उसीको ज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा प्राप्य परम अमृतस्वरूप परमानन्द कहा जाता है। ये सम्पूर्ण लोक उसीके आश्रित हैं। उसे कोई भी नहीं लाँघ सकता—कोई भी उसके नियमोंका अतिक्रमण नहीं कर सकता। सभी सदा सर्वदा एकमात्र उसीके शासनमें रहनेवाले और उसीके अधीन हैं। कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता। यही है वह ब्रह्म-तत्त्व जिसके विषयमें तुमने पूछा था॥ ८॥
**सम्बन्ध—**अब अग्निके दृष्टान्तसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी व्यापकता और निर्लेपताका वर्णन करते हैं—
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ ९॥
यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः अग्निः=एक ही अग्नि; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला-सा; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः [सन् अपि]=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उन्हींके जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहिः=और उनके बाहर भी है॥ ९॥
**व्याख्या—**एक ही अग्नि निराकाररूपसे सारे ब्रह्माण्डमें व्याप्त है, उसमें कोई भेद नहीं है, परंतु जब वह साकाररूपसे प्रज्वलित होता है, तब उन आधारभूत वस्तुओंका जैसा आकार होता है, वैसा ही आकार अग्निका भी दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमेश्वर एक हैं और सबमें समभावसे व्याप्त हैं, उनमें किसी प्रकारका कोई भेद नहीं है, तथापि वे भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें उन-उन प्राणियोंके अनुरूप नाना रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। भाव यह कि आधारभूत वस्तुके अनुरूप ही उनकी महिमाका प्राकट्य होता
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १५३
है। वास्तवमें उन परमेश्वरकी महत्ता इतनी ही नहीं है, इससे बहुत अधिक विलक्षण है। उनकी अनन्त शक्तिके एक क्षुद्रतम अंशसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नाना प्रकारकी आश्चर्यमय शक्तियोंसे सम्पन्न हो रहा है॥ ९॥
सम्बन्ध— वही बात वायुके दृष्टान्तसे कहते हैं—
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥
यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः वायुः= एक (ही) वायु; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला- सा; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः [ सन् अपि ]=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्= नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उन्हींके जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहिः=और उनके बाहर भी है ॥ १०॥
व्याख्या— एक ही वायु अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें व्याप्त है, तथापि व्यक्तमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके संयोगसे उन-उन वस्तुओंके अनुरूप गति और शक्तिवाला दिखायी देता है। उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमेश्वर एक होते हुए भी उन-उन प्राणियोंके सम्बन्धसे पृथक्-पृथक् शक्ति और गतिवाला दीखता है, किंतु वह उतना ही नहीं है, उन सबके बाहर भी अनन्त— असीम एवं विलक्षण रूपसे स्थित है (नवम मन्त्रकी व्याख्याके अनुसार इसे भी समझ लेना चाहिये) ॥ १०॥
सम्बन्ध— इस मन्त्रमें सूर्यके दृष्टान्तसे परमात्माकी निर्लेपता दिखलाते हैं—
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु- र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११॥
१५४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २
यथा=जिस प्रकार; सर्वलोकस्य=समस्त ब्रह्माण्डका; चक्षुः सूर्यः=प्रकाशक सूर्य देवता; चाक्षुषैः=(लोगोंकी) आँखोंसे होनेवाले; बाह्यदोषैः=बाहरके दोषोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; तथा=उसी प्रकार; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा; एकः=एक परब्रह्म परमात्मा; लोकदुःखेन=लोगोंके दुःखोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; [यतः]=क्योंकि; बाह्यः=सबमें रहता हुआ भी वह सबसे अलग है॥ ११॥
व्याख्या—एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है। उसका प्रकाश प्राणिमात्रकी आँखोंका सहायक है। उस प्रकाशकी ही सहायता लेकर लोग नाना प्रकारके गुणदोषमय कर्म करते हैं, परंतु सूर्य उनके नेत्रोंद्वारा किये जानेवाले नाना प्रकारके बाह्य कर्मरूप दोषोंसे तनिक भी लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार सबके अन्तर्यामी भगवान् परब्रह्म पुरुषोत्तम एक हैं, उन्हींकी शक्तिसे शक्तियुक्त होकर मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा मनुष्य नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करते हैं तथा उनका फलरूप सुख-दुःखादि भोगते हैं। परंतु वे परमेश्वर उनके कर्म और दुःखोंसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि वे सबमें रहते हुए भी सबसे पृथक् और सर्वथा असङ्ग हैं (गीता १३। ३१)॥ ११॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥*
यः=जो; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तर्यामी; एकः वशी=अद्वितीय एवं सबको वशमें रखनेवाला (परमात्मा); एकम् रूपम्=(अपने) एक ही रूपको; बहुधा=बहुत प्रकारसे; करोति=बना लेता है, तम् आत्मस्थम्=उस अपने अंदर रहनेवाले (परमात्मा) को; ये धीराः=जो ज्ञानी पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम् सुखम्=सदा अटल
* यह मन्त्र श्वेताश्वतरोपनिषद् ६। १२ से मिलता-जुलता है।
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १५५
रहनेवाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है); इतरेषाम् न=दूसरोंको नहीं ॥ १२ ॥
व्याख्या—जो परमात्मा सदा सबके अन्तरात्मारूपसे स्थित हैं, जो अद्वितीय और सर्वथा स्वतन्त्र हैं, सम्पूर्ण जगत्में देव-मनुष्यादि सभीको सदा अपने वशमें रखते हैं, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वभुवनसमर्थ परमेश्वर अपने एक ही रूपको अपनी लीलासे बहुत प्रकारका बना लेते हैं। उन परमात्माको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर अपने अंदर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाला—सनातन परमानन्द मिलता है, दूसरोंको नहीं ॥ १२ ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्* ॥ १३ ॥
यः=जो; नित्यानाम्=नित्योंका (भी); नित्यः=नित्य (है); चेतनानाम्=चेतनोंका (भी); चेतनः=चेतन है (और); एकः बहूनाम्=अकेला ही इन अनेक (जीवों) के; कामान्=कर्मफलभोगोंका; विदधाति=विधान करता है; तम् आत्मस्थम्=उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तम)-को; ये धीराः=जो ज्ञानी; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वती शान्तिः=सदा अटल रहनेवाली शान्ति (प्राप्त होती है); इतरेषाम् न=दूसरोंको नहीं ॥ १३ ॥
व्याख्या—जो समस्त नित्य चेतन आत्माओंके भी नित्य चेतन आत्मा हैं और जो स्वयं अकेले ही अनन्त जीवोंके भोगोंका उन-उनके कर्मानुसार विधान करते हैं, उन अपने अंदर रहनेवाले सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाली सनातनी परम शान्ति मिलती है, दूसरोंको नहीं ॥ १३ ॥
* इसका पूर्वार्ध श्वेताश्वतरोपनिषद् ६। १३ में ठीक इसी प्रकार है और उत्तरार्ध ६। १२ से मिलता है।
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सम्बन्ध— जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्तिके आनन्द और शान्तिकी महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा—
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा॥ १४॥
तत्=वह; अनिर्देश्यम्=अनिर्वचनीय; परमम्=परम; सुखम्=सुख; एतत्=यह (परमात्मा ही है); इति=यों; मन्यन्ते=(ज्ञानीजन) मानते हैं; तत्=उसको; कथम् नु=किस प्रकारसे; विजानीयाम्=मैं भलीभाँति समझूँ; किमु=क्या (वह); भाति=प्रकाशित होता है; वा=या; विभाति=अनुभवमें आता है॥ १४॥
व्याख्या— उस सनातन परम आनन्द और परम शान्तिको प्राप्त ज्ञानी महात्माजन ऐसा मानते हैं कि परब्रह्म पुरुषोत्तम ही वह अलौकिक सर्वोपरि आनन्द है, जिसका निर्देश मन-वाणीसे नहीं किया जा सकता। उस परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको मैं अपरोक्षरूपसे किस प्रकार जानूँ? क्या वह प्रत्यक्ष प्रकट होता है या अनुभवमें आता है? उसका ज्ञान किस प्रकारसे होता है?॥ १४॥
सम्बन्ध— नचिकेताके आन्तरिक भावको समझकर यमराजने कहा—
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥ १५॥*
तत्र=वहाँ; न सूर्यः भाति=न (तो) सूर्य प्रकाशित होता है; न चन्द्रतारकम्=न चन्द्रमा और तारोंका समुदाय (ही प्रकाशित होता है); न इमाः विद्युत: भान्ति=(और) न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित होती हैं; अयम् अग्निः कुतः=फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि);
* यह मन्त्र ठीक इसी प्रकार मु० उ० २। २। १० और श्वेता० उ० ६। १४ में है।
वल्ली ३ ]
कठोपनिषद्
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तम्=उसके; भान्तम् एव=प्रकाशित होनेपर ही (उसीके प्रकाशसे); सर्वम्= (ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि) सब; अनुभाति=प्रकाशित होते हैं; तस्य भासा=उसीके प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥
व्याख्या—उस स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है; क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाशशक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशकके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं। सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उस जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक क्षुद्रतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १५ ॥
द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ (५)
तृतीय वल्ली
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्रुस्थः सनातनः ।
तदेव शुक्ं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नार्येति कश्चन ॥
एतद्वै तत् ॥ १ ॥
ऊर्ध्वमूलः=ऊपरकी ओर मूलवाला; अवाक्शाखः=नीचेकी ओर शाखावाला; एषः=यह (प्रत्यक्ष जगत्); सनातनः अश्रुस्थः=सनातन पीपलका वृक्ष है; [ तन्मूलम् ]=इसका मूलभूत; तत् एव शुक्म=वह (परमेश्वर) ही विशुद्ध तत्त्व है;
१५८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
तत् ब्रह्म=वही ब्रह्म है (और); तत् एव=वही; अमृतम् उच्यते=अमृत कहलाता है; सर्वे लोकाः=सब लोक; तस्मिन्=उसीके; श्रिताः=आश्रित हैं; कश्चन उ=कोई भी; तत्=उसको; न अत्येति=लाँघ नहीं सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा जिसके विषयमें तुमने पूछा था)* ॥ १ ॥
व्याख्या —जिसका मूलभूत परब्रह्म पुरुषोत्तम ऊपर है अर्थात् सर्वश्रेष्ठ, सबसे सूक्ष्म और सर्वशक्तिमान् है और जिसकी प्रधान शाखा ब्रह्मा तथा अवान्तर शाखाएँ देव, पितर, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि क्रमसे नीचे हैं, ऐसा यह ब्रह्माण्डरूप पीपल-वृक्ष अनादिकालीन—सदासे है। कभी प्रकटरूपसे और कभी अप्रकटरूपसे अपने कारणरूप परब्रह्ममें नित्य स्थित रहता है, अतः सनातन है। इसका जो मूल कारण है, जिससे यह उत्पन्न होता है, जिससे सुरक्षित है और जिसमें विलीन होता है, वही विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही ब्रह्म है, उसीको अमृत कहते हैं तथा सब लोक उसीके आश्रित हैं। कोई भी उसका अतिक्रमण करनेमें समर्थ नहीं है। नचिकेता! यही है वह तत्त्व, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥
यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।
महद्भ्यं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुर्मुतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥
निःसृतम्=(परब्रह्म परमेश्वरसे) निकला हुआ; इदम् यत् किं च=यह जो कुछ भी; सर्वम् जगत्=सम्पूर्ण जगत् है; प्राणे एजति=उस प्राणस्वरूप परमेश्वरमें ही चेष्टा करता है; एतत्=इस; उद्यतम् वज्रम्=उठे हुए वज्रके समान; महत् भयम्=महान् भयस्वरूप (सर्वशक्तिमान्) परमेश्वरको; ये विदुः=जो जानते हैं; ते=वे; अमृताः भवन्ति=अमर हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥
व्याख्या —यह जो कुछ भी इन्द्रिय, मन और बुद्धिके द्वारा देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाला सम्पूर्ण चराचर जगत् है, सब अपने परम कारण-
- इस मन्त्रके प्रथम दो पादोंको छोड़कर शेष चारों पाद २।२।८ के ही समान हैं।
वल्ल्नी ३ ]
कठोपनिषद्
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रूप जिन परब्रह्म पुरुषोत्तमसे प्रकट हुआ है, उन्हीं प्राणस्वरूप परमेश्वरमें चेष्टा करता है। अर्थात् इसकी चेष्टाओंके आधार एवं नियामक भी वे परमेश्वर ही हैं। वे परमेश्वर परम दयालु होते हुए भी महान् भयरूप हैं—छोटे-बड़े सभी उनसे भय मानते हैं। साथ ही वे उठे हुए वज्रके समान हैं। जिस प्रकार हाथमें वज्र लिये हुए प्रभुको देखकर सभी सेवक यथाविधि निरन्तर आज्ञापालनमें तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार समस्त देवता सदा-सर्वदा नियमानुसार इन परमेश्वरके आज्ञापालनमें नियुक्त रहते हैं। इन परब्रह्मको जो जानते हैं, वे तत्त्वज्ञ पुरुष अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥
भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश् वायुश् मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥*
अस्य भयात्=इसीके भयसे; अग्निः तपति=अग्नि तपता है; भयात्= (इसीके) भयसे; सूर्यः तपति=सूर्य तपता है; च=तथा; [ अस्य ] भयात्= इसीके भयसे; इन्द्रः वायुः=इन्द्र, वायु; च=और; पञ्चमः मृत्युः=पाँचवें मृत्यु देवता; धावति=(अपने-अपने काममें) प्रवृत्त हो रहे हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या —सबपर शासन करनेवाले और सबको नियन्त्रणमें रखकर नियमानुसार चलानेवाले इन परमेश्वरके भयसे ही अग्नि तपता है, इन्हींके भयसे सूर्य तप रहा है, इन्हींके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब दौड़-दौड़कर जल आदि बरसाना, प्राणियोंको जीवन-शक्ति प्रदान करना, जीवोंके शरीरोंका अन्त करना आदि अपना-अपना काम सावधानीपूर्वक कर रहे हैं। सारांश यह कि इस जगत्में देवसमुदायके द्वारा सारे कार्य जो नियमितरूपसे सम्पन्न हो रहे हैं, वे इन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सबके शासक एवं नियन्ता परमेश्वरके अमोघ शासनसे ही हो रहे हैं ॥ ३ ॥
- इस भावका मन्त्र तै० उ० २।८ के आरम्भमें आया है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
इह चेदशकद् बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्वसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
चेत्=यदि; शरीरस्य=शरीरका; विस्वसः=पतन होनेसे; प्राक्=पहले-पहले; इह=इस मनुष्यशरीरमें ही (साधक); बोद्धुम्=परमात्माको साक्षात्; अशक्तत्=कर सका (तब तो ठीक है); ततः=नहीं तो फिर; सर्गेषु=अनेक कल्पोंतक; लोकेषु=नाना लोक और योनियोंमें; शरीरत्वाय कल्पते=शरीर धारण करनेको विवश होता है ॥ ४ ॥
व्याख्या—इस सर्वशक्तिमान्, सबके प्रेरक और सबपर शासन करनेवाले परमेश्वरको यदि कोई साधक इस दुर्लभ मनुष्यशरीरका नाश होनेसे पहले ही जान लेता है, अर्थात् जबतक इसमें भजन-स्मरण आदि साधन करनेकी शक्ति बनी हुई है और जबतक यह मृत्युके मुखमें नहीं चला जाता, तभीतक (इसके रहते-रहते ही) सावधानीके साथ प्रयत्न करके परमात्माके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब तो उसका जीवन सफल हो जाता है; अनादि कालसे जन्म-मृत्युके प्रवाहमें पड़ा हुआ वह जीव उससे छुटकारा पा जाता है। नहीं तो, फिर उसे अनेक कल्पोंतक विभिन्न लोकों और योनियोंमें शरीर धारण करनेके लिये बाध्य होना पड़ता है। अतएव मनुष्यको मृत्युसे पहले-पहले ही परमात्माको जान लेना चाहिये ॥ ४ ॥
यथाऽऽदर्शं तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥
यथा आदर्शं=जैसे दर्पणमें (सामने आयी हुई वस्तु दीखती है); तथा आत्मनि=वैसे ही शुद्ध अन्तःकरणमें (ब्रह्मके दर्शन होते हैं); यथा स्वप्ने=जैसे स्वप्नमें (वस्तु स्पष्ट दिखलायी देती है); तथा पितृलोके=उसी प्रकार पितृलोकमें (परमेश्वर दीखता है); यथा अप्सु=जैसे जलमें (वस्तुके रूपकी झलक पड़ती है); तथा गन्धर्वलोके=उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें; परि ददृशे इव=परमात्माकी झलक-सी पड़ती है (और); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें (तो); छायातपयोः
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
१६१
इव=छाया और धूपकी भाँति (आत्मा और परमात्मा दोनोंका स्वरूप पृथक्-पृथक् स्पष्ट दिखलायी देता है) ॥५॥
व्याख्या —जैसे मलरहित दर्पणमें उसके सामने आयी हुई वस्तु दर्पणसे विलक्षण और स्पष्ट दिखलायी देती है, उसी प्रकार ज्ञानी महापुरुषोंके विशुद्ध अन्तःकरणमें वे परमेश्वर उससे विलक्षण एवं स्पष्ट दिखलायी देते हैं। जैसे स्वप्नमें वस्तुसमूह यथार्थरूपमें न दीखकर स्वप्नद्रष्टा मनुष्यकी वासना और विविध संस्कारोंके अनुसार कहींकी वस्तु कहीं विशुद्धलरूपसे अस्पष्ट दिखायी देती है, वैसे ही पितुलोकमें परमेश्वरका स्वरूप यथावत् स्पष्ट न दीखकर अस्पष्ट ही दीखता है; क्योंकि पितुलोकको प्राप्त प्राणियोंको पूर्वजन्मकी स्मृति और वहाँके सम्बन्धियोंका पूर्ववत् ज्ञान होनेके कारण वे तदनुरूप वासनाजालमें आबद्ध रहते हैं। गन्धर्वलोक पितुलोककी अपेक्षा कुछ श्रेष्ठ है; इसलिये जैसे स्वप्नकी अपेक्षा जाग्रत्-अवस्थामें जलके अंदर देखनेपर प्रतिबिम्ब कुछ-का-कुछ न दीखकर यथावत् तो दीखता है, परंतु जलकी लहरोंके कारण हिलता हुआ-सा प्रतीत होता है, स्पष्ट नहीं दीखता, वैसे ही गन्धर्वलोकमें भी भोग-लहरियोंमें लहराते हुए चित्तसे युक्त वहाँके निवासियोंको भगवान्के सर्वथा स्पष्ट दर्शन नहीं होते। किंतु ब्रह्मलोकमें वहाँ रहनेवालोंको छाया और धूपकी तरह अपना और उन परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञान प्रत्यक्ष और सुस्पष्ट होता है। वहाँ किसी प्रकारका भ्रम नहीं रहता। प्रथम अध्यायकी तीसरी वल्लीके पहले मन्त्रमें भी बतलाया गया है कि यह मनुष्यशरीर भी एक लोक है, इसमें परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्मा—दोनों धूप और छायाकी तरह हृदयरूप गुफामें रहते हैं। अतः मनुष्यको दूसरे लोकोंकी कामना न करके इस मनुष्यशरीरके रहते-रहते ही उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लेना चाहिये। यही इसका अभिप्राय है ॥५॥
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत्।
पृथग्गुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥६॥
पृथक् =(अपने-अपने कारणसे) भिन्न-भिन्न रूपोंमें; उत्पद्यमानानाम् =उत्पन्न हुई; इन्द्रियाणाम् =इन्द्रियोंकी; यत् =जो; पृथक् भावम् =पृथक्-पृथक् सत्ता है;
१६२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
च=और; [ यत् ]=जो उनका; उदयास्तमयौ=उदय और लय हो जानारूप स्वभाव है; [ तत् ]=उसे; मत्वा=जानकर; धीरः=(आत्माका स्वरूप उनसे विलक्षण समझनेवाला) धीर पुरुष; न शोचति=शोक नहीं करता ॥ ६ ॥
व्याख्या —शब्द-स्पर्शादि विषयोंके अनुभवरूप पृथक्-पृथक् कार्य करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो पृथक्-पृथक् भाव हैं तथा जाग्रत्-अवस्थामें कार्यशील हो जाना और सुषुप्तिकालमें लय हो जानारूप जो उनकी परिवर्तनशीलता है, इनपर विचार करके जब बुद्धिमान् मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है कि 'ये इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि या इनका संघातरूप यह शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इनसे सर्वथा विलक्षण नित्य चेतन हूँ, सर्वथा विशुद्ध एवं सदा एकरस हूँ,' तब वह किसी प्रकारका शोक नहीं करता, सदाके लिये दुःख और शोकसे रहित हो जाता है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध —अगले दो मन्त्रोंमें तत्त्वविचार करते हैं—
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥
इन्द्रियेभ्यः =इन्द्रियोंसे (तो); मनः =मन; परम् =श्रेष्ठ है; मनसः =मनसे; सत्त्वम् =बुद्धि; उत्तमम् =उत्तम है; सत्त्वात् =बुद्धिसे; महान् आत्मा =उसका स्वामी जीवात्मा; अधि =ऊँचा है (और); महतः =जीवात्मासे; अव्यक्तम् =अव्यक्त शक्ति; उत्तमम् =उत्तम है ॥ ७ ॥
व्याख्या —इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि उत्तम है, बुद्धिसे इनका स्वामी जीवात्मा ऊँचा है; क्योंकि उन सबपर इसका अधिकार है। वे सभी इसकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं और यह उनका शासक है, अतः उनसे सर्वथा विलक्षण है। इस जीवात्मासे भी इसका अव्यक्त (कारण) शरीर प्रबल है, जो कि भगवान्की उस प्रकृतिका अंश है, जिसने इसको बन्धनमें डाल रखा है। तुलसीदासजीने भी कहा है 'जैहि बस कीन्हें जीव निकाया'। गीतामें भी प्रकृतिजनित तीनों गुणोंके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेकी बात कही गयी है (१४।५) ॥ ७ ॥
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
१६३
अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥८॥*
तु=परंतु; अव्यक्तात्=अव्यक्तसे (भी वह); व्यापकः=व्यापक; च=और; अलिङ्गः एव=सर्वथा आकाररहित; पुरुषः=परमपुरुष; परः=श्रेष्ठ है; यम्=जिसको; ज्ञात्वा=जानकर; जन्तुः=जीवात्मा; मुच्यते=मुक्त हो जाता है; च=और; अमृतत्वम्=अमृतस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको; गच्छति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥
व्याख्या—परंतु इस प्रकृतिसे भी इसके स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ हैं, जो निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक हैं (गीता १।४)। जिनको जानकर यह जीवात्मा प्रकृतिके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप परमानन्दको पा लेता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये इसके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी शरण ग्रहण करे। (गीता ७।१४) परमात्मा जब इस जीवपर दया करके मायाके परदेको हटा लेते हैं, तभी इसको उनकी प्राप्ति होती है। नहीं तो यह मूढ़ जीव सर्वदा अपने समीप रहते हुए भी उन परमेश्वरको पहचान नहीं पाता ॥८॥
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हदा मनीषा मनसाभिवलूसो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥९॥†
अस्य=इस परमेश्वरका; रूपम्=वास्तविक स्वरूप; संदृशे=अपने सामने प्रत्यक्ष विषयके रूपमें; न तिष्ठति=नहीं ठहरता; एनम्=इसको; कश्चन=कोई भी; चक्षुषा=चर्मचक्षुओंद्वारा; न पश्यति=नहीं देख पाता; मनसा=मनसे; अभिवलूसः=बारम्बार चिन्तन करके ध्यानमें लाया हुआ (वह परमात्मा); हदा=निर्मल और निश्चल
- इसका विस्तार इसी उपनिषद्के १।३।१०,११ में देखना चाहिये।
† इससे मिलता-जुलता मन्त्र श्वेता० उ० ४।२० है।
१६४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
हृदयसे; मनीषा=(और) विशुद्ध बुद्धिके द्वारा; [ दूरयते ]=देखनेमें आता है; चे एतत् विदुः=जो इसको जानते हैं; ते अमृताः भवन्ति=वे अमृत (आनन्द) स्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥
व्याख्या —इन परब्रह्म परमेश्वरका दिव्यस्वरूप प्रत्यक्ष विषयके रूपमें अपने सामने नहीं ठहरता; परमात्माके दिव्यरूपको कोई भी मनुष्य प्राकृत चर्मचक्षुओंके द्वारा नहीं देख सकता। जो भाग्यवान् साधक निरन्तर प्रेमपूर्वक मनसे उनका चिन्तन करता रहता है, उसके हृदयमें जब भगवान्के उस दिव्यस्वरूपका ध्यान प्रगाढ़ होता है, उस समय उस साधकका हृदय भगवान्के ध्यानजनित स्वरूपमें निश्चल हो जाता है। ऐसे निश्चल हृदयसे ही वह साधक विशुद्ध बुद्धिरूप नेत्रोंके द्वारा परमात्माके उस दिव्यस्वरूपकी झाँकी करता है। जो इन परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं, अर्थात् परमानन्दस्वरूप बन जाते हैं ॥ ९ ॥
सम्बन्ध —योगधारणके द्वारा मन और इन्द्रियोंको रोककर परमात्माको प्राप्त करनेका दूसरा साधन बतलाते हैं—
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्र न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥
यदा=जब; मनसा सह=मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि=पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते=भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धिः च=और बुद्धि भी; न विचेष्टति=किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम्=उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहुः=(योगी) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥
व्याख्या —योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है, जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता, उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती, उस स्थितिको योगीगण परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति बतलाते हैं ॥ १० ॥
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
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तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
ताम्=उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम्=इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति='योग'; मन्यन्ते=मानते हैं; हि=क्योंकि; तदा=उस समय; अप्रमत्तः=(साधक) प्रमादरहित; भवति=हो जाता है; योगः=योग; प्रभवाप्ययौ=उदय और अस्त होनेवाला है ॥ ११ ॥
व्याख्या—इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभव योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषय-दर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परंतु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है; अतः परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ़ अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ११ ॥
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति बुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥
न वाचा=(वह परब्रह्म परमेश्वर) न तो वाणीसे; न मनसा=न मनसे (और); न चक्षुषा एव=न नेत्रोंसे ही; प्राप्तुम् शक्यः=प्राप्त किया जा सकता है (फिर); तत् अस्ति='वह अवश्य है'; इति बुवतः अन्यत्र=इस प्रकार कहनेवालेके अतिरिक्त दूसरेको; कथम् उपलभ्यते=कैसे मिल सकता है ॥ १२ ॥
व्याख्या—वह परब्रह्म परमात्मा वाणी आदि कर्मैन्द्रियोंसे, चक्षु आदि ज्ञानैन्द्रियोंसे और मन-बुद्धिरूप अन्तःकरणसे भी नहीं प्राप्त किया जा सकता; क्योंकि वह इन सबकी पहुँचसे परे है। परंतु वह है अवश्य और उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा रखनेवालेको वह अवश्य मिलता है—इस बातको जो नहीं कहता, नहीं स्वीकार करता अर्थात् इसपर जिसका दृढ़ विश्वास नहीं है, उसको वह कैसे मिल सकता है। अतः पूर्व मन्त्रोंमें बतलायी हुई रीतिके अनुसार इन्द्रिय-मन आदि सबको योगाभ्यासके द्वारा रोककर 'वह अवश्य
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
है और साधकको मिलता है' ऐसे दृढ़तम निश्चयसे निरन्तर उसकी प्राप्तिके लिये परम उत्कण्ठाके साथ प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥ १२ ॥
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥
अस्ति=(अतः उस परमात्माको पहले तो) 'वह अवश्य है'; इति एव=इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धव्यः=ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् पहले उसके अस्तित्वका दृढ़ निश्चय करना चाहिये; [तदनु]=तदनन्तर; तत्त्वभावेन=तत्त्वभावसे भी; [उपलब्धव्यः]=उसे प्राप्त करना चाहिये; उभयोः=इन दोनों प्रकारोंमेंसे; अस्ति इति एव='वह अवश्य है' इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धस्य=परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेवाले साधकके लिये; तत्त्वभावः=परमात्माका तात्त्विक स्वरूप (अपने-आप); प्रसीदति=(शुद्ध हृदयमें) प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥
व्याख्या —साधकको चाहिये कि पहले तो वह इस बातका दृढ़ निश्चय करे कि 'परमेश्वर अवश्य हैं और वे साधकको अवश्य मिलते हैं'; फिर इसी विश्वाससे उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तात्त्विक विवेचनपूर्वक निरन्तर उनका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वाससे भगवान्को स्वीकार कर लेता है कि 'वे अवश्य हैं और अपने हृदयमें ही विराजमान हैं, उनकी प्राप्ति अवश्य होती है', तो परमात्माका वह तात्त्विक दिव्य स्वरूप उसके विशुद्ध हृदयमें अपने-आप प्रकट हो जाता है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है ॥ १३ ॥
सम्बन्ध —अब निष्कामभावकी महिमा बतलाते हैं—
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
अस्य=इस (साधक) के; हृदि श्रिताः=हृदयमें स्थित; ये कामाः=जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा=(वे) सब-की-सब जब; प्रमुच्यन्ते=समूल नष्ट हो जाती हैं; अथ=तब; मर्त्यः=मरणधर्मा मनुष्य; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता
वल्ली ३ ] कठोपनिषद् १६७
है (और); अत्र=(वह) यहीं; **ब्रह्म समश्नुते=**ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है॥ १४॥
**व्याख्या—**मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी ऐहलौकिक और पारलौकिक कामनाओंसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं; तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था—अमर हो जाता है और यहीं—इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है॥ १४॥
**सम्बन्ध—**संशयरहित दृढ़ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं—
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ १५॥
**यदा=**जब (इसको); **हृदयस्य=**हृदयकी; **सर्वे=**सम्पूर्ण; **ग्रन्थयः=**ग्रन्थियाँ; **प्रभिद्यन्ते=**भलीभाँति खुल जाती हैं; **अथ=**तब; **मर्त्यः=**वह मरणधर्मा मनुष्य; **इह=**इसी शरीरमें; **अमृतः=**अमर; **भवति=**हो जाता है; **हि एतावत्=**बस, इतना ही; **अनुशासनम्=**सनातन उपदेश है॥ १५॥
**व्याख्या—**जब साधकके हृदयकी अहंता-ममतारूप समस्त अज्ञान-ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकारके संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि 'परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं', तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है॥ १५॥
**सम्बन्ध—**अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं—
शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।