ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
ताम्=उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम्=इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति='योग'; मन्यन्ते=मानते हैं; हि=क्योंकि; तदा=उस समय; अप्रमत्तः=(साधक) प्रमादरहित; भवति=हो जाता है; योगः=योग; प्रभवाप्ययौ=उदय और अस्त होनेवाला है ॥ ११ ॥
व्याख्या—इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभव योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषय-दर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परंतु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है; अतः परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ़ अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ११ ॥
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति बुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥
न वाचा=(वह परब्रह्म परमेश्वर) न तो वाणीसे; न मनसा=न मनसे (और); न चक्षुषा एव=न नेत्रोंसे ही; प्राप्तुम् शक्यः=प्राप्त किया जा सकता है (फिर); तत् अस्ति='वह अवश्य है'; इति बुवतः अन्यत्र=इस प्रकार कहनेवालेके अतिरिक्त दूसरेको; कथम् उपलभ्यते=कैसे मिल सकता है ॥ १२ ॥
व्याख्या—वह परब्रह्म परमात्मा वाणी आदि कर्मैन्द्रियोंसे, चक्षु आदि ज्ञानैन्द्रियोंसे और मन-बुद्धिरूप अन्तःकरणसे भी नहीं प्राप्त किया जा सकता; क्योंकि वह इन सबकी पहुँचसे परे है। परंतु वह है अवश्य और उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा रखनेवालेको वह अवश्य मिलता है—इस बातको जो नहीं कहता, नहीं स्वीकार करता अर्थात् इसपर जिसका दृढ़ विश्वास नहीं है, उसको वह कैसे मिल सकता है। अतः पूर्व मन्त्रोंमें बतलायी हुई रीतिके अनुसार इन्द्रिय-मन आदि सबको योगाभ्यासके द्वारा रोककर 'वह अवश्य