ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
है और साधकको मिलता है' ऐसे दृढ़तम निश्चयसे निरन्तर उसकी प्राप्तिके लिये परम उत्कण्ठाके साथ प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥ १२ ॥
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥
अस्ति=(अतः उस परमात्माको पहले तो) 'वह अवश्य है'; इति एव=इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धव्यः=ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् पहले उसके अस्तित्वका दृढ़ निश्चय करना चाहिये; [तदनु]=तदनन्तर; तत्त्वभावेन=तत्त्वभावसे भी; [उपलब्धव्यः]=उसे प्राप्त करना चाहिये; उभयोः=इन दोनों प्रकारोंमेंसे; अस्ति इति एव='वह अवश्य है' इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धस्य=परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेवाले साधकके लिये; तत्त्वभावः=परमात्माका तात्त्विक स्वरूप (अपने-आप); प्रसीदति=(शुद्ध हृदयमें) प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥
व्याख्या —साधकको चाहिये कि पहले तो वह इस बातका दृढ़ निश्चय करे कि 'परमेश्वर अवश्य हैं और वे साधकको अवश्य मिलते हैं'; फिर इसी विश्वाससे उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तात्त्विक विवेचनपूर्वक निरन्तर उनका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वाससे भगवान्को स्वीकार कर लेता है कि 'वे अवश्य हैं और अपने हृदयमें ही विराजमान हैं, उनकी प्राप्ति अवश्य होती है', तो परमात्माका वह तात्त्विक दिव्य स्वरूप उसके विशुद्ध हृदयमें अपने-आप प्रकट हो जाता है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है ॥ १३ ॥
सम्बन्ध —अब निष्कामभावकी महिमा बतलाते हैं—
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
अस्य=इस (साधक) के; हृदि श्रिताः=हृदयमें स्थित; ये कामाः=जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा=(वे) सब-की-सब जब; प्रमुच्यन्ते=समूल नष्ट हो जाती हैं; अथ=तब; मर्त्यः=मरणधर्मा मनुष्य; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता