ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली ३ ] कठोपनिषद् १६७
है (और); अत्र=(वह) यहीं; **ब्रह्म समश्नुते=**ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है॥ १४॥
**व्याख्या—**मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी ऐहलौकिक और पारलौकिक कामनाओंसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं; तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था—अमर हो जाता है और यहीं—इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है॥ १४॥
**सम्बन्ध—**संशयरहित दृढ़ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं—
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ १५॥
**यदा=**जब (इसको); **हृदयस्य=**हृदयकी; **सर्वे=**सम्पूर्ण; **ग्रन्थयः=**ग्रन्थियाँ; **प्रभिद्यन्ते=**भलीभाँति खुल जाती हैं; **अथ=**तब; **मर्त्यः=**वह मरणधर्मा मनुष्य; **इह=**इसी शरीरमें; **अमृतः=**अमर; **भवति=**हो जाता है; **हि एतावत्=**बस, इतना ही; **अनुशासनम्=**सनातन उपदेश है॥ १५॥
**व्याख्या—**जब साधकके हृदयकी अहंता-ममतारूप समस्त अज्ञान-ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकारके संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि 'परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं', तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है॥ १५॥
**सम्बन्ध—**अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं—
शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।