ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥
हृदयस्य = हृदयकी; शतम् च एका च = (कुल मिलाकर) एक सौ एक; नाड्यः = नाड़ियाँ हैं; तासाम् = उनमेंसे; एका = एक; मूर्धानम् = मूर्धा (कपाल) की ओर; अभिनिःसृता = निकली हुई है (इसे ही सुषुम्णा कहते हैं); तया = उसके द्वारा; ऊर्ध्वम् = ऊपरके लोकोंमें; आयन् = जाकर (मनुष्य); अमृतत्वम् = अमृतभावको; एति = प्राप्त हो जाता है; अन्याः = दूसरी एक सौ नाड़ियाँ; उत्क्रमणे = मरणकालमें (जीवको); विष्वङ् = नाना प्रकारकी योनियोंमें ले जानेकी हेतु; भवन्ति = होती हैं ॥ १६ ॥
व्याख्या— हृदयमें एक सौ एक प्रधान नाड़ियाँ हैं, जो वहाँसे सब ओर फैली हुई हैं। उनमेंसे एक नाड़ी, जिसको सुषुम्णा कहते हैं, हृदयसे मस्तककी ओर गयी है। भगवान्के परमधाममें जानेका अधिकारी उस नाड़ीके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर सबसे ऊँचे लोकमें अर्थात् भगवान्के परमधाममें जाकर अमृतस्वरूप परमानन्दमय परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है; और दूसरे जीव मरणकालमें दूसरी नाड़ियोंके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर अपने-अपने कर्म और वासनाके अनुसार नाना योनियोंको प्राप्त होते हैं ॥ १६ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण तं विद्याच्छुक्रममृतं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥*
अन्तरात्मा = सबका अन्तर्यामी; अङ्गुष्ठमात्रः = अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुषः = परमपुरुष; सदा = सदैव; जनानाम् = मनुष्योंके; हृदये = हृदयमें; सन्निविष्टः = भलीभाँति प्रविष्ट है; तम् = उसको; मुञ्जात् = मूँजसे; इषीकाम् इव = सींककी भाँति; स्वात् = अपनेसे (और); शरीरात् = शरीरसे; धैर्येण = धीरतापूर्वक; प्रवृहेत् = पृथक् करके देखे;
* इसका पूर्वार्ध श्वेता० ३ । १३ के पूर्वार्धसे मिलता है।