ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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तम्=उसीको; शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे; तम् शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=(और) उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे ॥ १७ ॥
व्याख्या —सबके अन्तर््यामी परमपुरुष परमेश्वर हृदयके अनुरूप अङ्गुष्ठमात्र रूपवाले होकर सदैव सभी मनुष्योंके भीतर निवास करते हैं, तो भी मनुष्य उनकी ओर देखतातक नहीं। जो प्रमादरहित होकर उनकी प्राप्तिके साधनमें लगे हैं, उन मनुष्योंको चाहिये कि उन शरीरस्थ परमेश्वरको इस शरीरसे और अपने-आपसे भी उसी तरह पृथक् और विलक्षण समझें, जैसे साधारण लोग मूँजसे सीकको पृथक् देखते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मूँजमें रहनेवाली सीक मूँजसे विलक्षण और पृथक् है, उसी प्रकार वह शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाला परमेश्वर उन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है। वही विशुद्ध अमृत है, वही विशुद्ध अमृत है। यहाँ यह वाक्यकी पुनरावृत्ति उपदेशकी समाप्ति एवं सिद्धान्तकी निश्चितताको सूचित करती है ॥ १७ ॥
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्। ब्रह्मप्राप्नो विरजोऽभूद्विमृत्यु- रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥
अथ=इस प्रकार उपदेश सुननेके अनन्तर; नचिकेतः=नचिकेता; मृत्युप्रोक्ताम्=यमराजद्वारा बतलायी हुई; एताम्=इस; विद्याम्=विद्याको; च=और; कृत्स्नम्=सम्पूर्ण; योगविधिम्=योगकी विधिको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; विमृत्युः=मृत्युसे रहित (और); विरजः [ सन् ]=सब प्रकारके विकारोंसे शून्य विशुद्ध होकर; ब्रह्मप्राप्तः अभूत्=ब्रह्मको प्राप्त हो गया; अन्यः अपि यः=दूसरा भी जो कोई; [ इदम् ] अध्यात्मम् एवंवित्=इस अध्यात्मविद्याको इसी प्रकार जाननेवाला है; [ सः अपि एवम् ] एव [ भवति ]=वह भी ऐसा ही हो जाता है अर्थात् मृत्यु और विकारोंसे रहित होकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥
व्याख्या —इस प्रकार यमराजके द्वारा उपदिष्ट समस्त विवेचनको श्रद्धापूर्वक