ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
हृदयसे; मनीषा=(और) विशुद्ध बुद्धिके द्वारा; [ दूरयते ]=देखनेमें आता है; चे एतत् विदुः=जो इसको जानते हैं; ते अमृताः भवन्ति=वे अमृत (आनन्द) स्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥
व्याख्या —इन परब्रह्म परमेश्वरका दिव्यस्वरूप प्रत्यक्ष विषयके रूपमें अपने सामने नहीं ठहरता; परमात्माके दिव्यरूपको कोई भी मनुष्य प्राकृत चर्मचक्षुओंके द्वारा नहीं देख सकता। जो भाग्यवान् साधक निरन्तर प्रेमपूर्वक मनसे उनका चिन्तन करता रहता है, उसके हृदयमें जब भगवान्के उस दिव्यस्वरूपका ध्यान प्रगाढ़ होता है, उस समय उस साधकका हृदय भगवान्के ध्यानजनित स्वरूपमें निश्चल हो जाता है। ऐसे निश्चल हृदयसे ही वह साधक विशुद्ध बुद्धिरूप नेत्रोंके द्वारा परमात्माके उस दिव्यस्वरूपकी झाँकी करता है। जो इन परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं, अर्थात् परमानन्दस्वरूप बन जाते हैं ॥ ९ ॥
सम्बन्ध —योगधारणके द्वारा मन और इन्द्रियोंको रोककर परमात्माको प्राप्त करनेका दूसरा साधन बतलाते हैं—
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्र न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥
यदा=जब; मनसा सह=मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि=पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते=भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धिः च=और बुद्धि भी; न विचेष्टति=किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम्=उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहुः=(योगी) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥
व्याख्या —योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है, जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता, उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती, उस स्थितिको योगीगण परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति बतलाते हैं ॥ १० ॥