भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

१६४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

हृदयसे; मनीषा=(और) विशुद्ध बुद्धिके द्वारा; [ दूरयते ]=देखनेमें आता है; चे एतत् विदुः=जो इसको जानते हैं; ते अमृताः भवन्ति=वे अमृत (आनन्द) स्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥

व्याख्या —इन परब्रह्म परमेश्वरका दिव्यस्वरूप प्रत्यक्ष विषयके रूपमें अपने सामने नहीं ठहरता; परमात्माके दिव्यरूपको कोई भी मनुष्य प्राकृत चर्मचक्षुओंके द्वारा नहीं देख सकता। जो भाग्यवान् साधक निरन्तर प्रेमपूर्वक मनसे उनका चिन्तन करता रहता है, उसके हृदयमें जब भगवान्के उस दिव्यस्वरूपका ध्यान प्रगाढ़ होता है, उस समय उस साधकका हृदय भगवान्के ध्यानजनित स्वरूपमें निश्चल हो जाता है। ऐसे निश्चल हृदयसे ही वह साधक विशुद्ध बुद्धिरूप नेत्रोंके द्वारा परमात्माके उस दिव्यस्वरूपकी झाँकी करता है। जो इन परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं, अर्थात् परमानन्दस्वरूप बन जाते हैं ॥ ९ ॥

सम्बन्ध —योगधारणके द्वारा मन और इन्द्रियोंको रोककर परमात्माको प्राप्त करनेका दूसरा साधन बतलाते हैं—

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्र न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥

यदा=जब; मनसा सह=मनके सहित; पञ्च ज्ञानानि=पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ; अवतिष्ठन्ते=भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं; बुद्धिः च=और बुद्धि भी; न विचेष्टति=किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं करती; ताम्=उस स्थितिको; परमाम् गतिम् आहुः=(योगी) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥

व्याख्या —योगाभ्यास करते-करते जब मनके सहित पाँचों इन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी एक परमात्माके स्वरूपमें इस प्रकार स्थित हो जाती है, जिससे उसको परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुका तनिक भी ज्ञान नहीं रहता, उससे कोई भी चेष्टा नहीं बनती, उस स्थितिको योगीगण परमगति—योगकी सर्वोत्तम स्थिति बतलाते हैं ॥ १० ॥

वल्ल्बी ३ ]

कठोपनिषद्

१६५

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।

अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥

ताम्=उस; स्थिराम् इन्द्रियधारणाम्=इन्द्रियोंकी स्थिर धारणाको ही; योगम् इति='योग'; मन्यन्ते=मानते हैं; हि=क्योंकि; तदा=उस समय; अप्रमत्तः=(साधक) प्रमादरहित; भवति=हो जाता है; योगः=योग; प्रभवाप्ययौ=उदय और अस्त होनेवाला है ॥ ११ ॥

व्याख्या—इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी स्थिर धारणाका ही नाम योग है—ऐसा अनुभव योगी महानुभाव मानते हैं; क्योंकि उस समय साधक विषय-दर्शनरूप सब प्रकारके प्रमादसे सर्वथा रहित हो जाता है। परंतु यह योग उदय और अस्त होनेवाला है; अतः परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छावाले साधकको निरन्तर योगयुक्त रहनेका दृढ़ अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ११ ॥

नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।

अस्तीति बुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥

न वाचा=(वह परब्रह्म परमेश्वर) न तो वाणीसे; न मनसा=न मनसे (और); न चक्षुषा एव=न नेत्रोंसे ही; प्राप्तुम् शक्यः=प्राप्त किया जा सकता है (फिर); तत् अस्ति='वह अवश्य है'; इति बुवतः अन्यत्र=इस प्रकार कहनेवालेके अतिरिक्त दूसरेको; कथम् उपलभ्यते=कैसे मिल सकता है ॥ १२ ॥

व्याख्या—वह परब्रह्म परमात्मा वाणी आदि कर्मैन्द्रियोंसे, चक्षु आदि ज्ञानैन्द्रियोंसे और मन-बुद्धिरूप अन्तःकरणसे भी नहीं प्राप्त किया जा सकता; क्योंकि वह इन सबकी पहुँचसे परे है। परंतु वह है अवश्य और उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा रखनेवालेको वह अवश्य मिलता है—इस बातको जो नहीं कहता, नहीं स्वीकार करता अर्थात् इसपर जिसका दृढ़ विश्वास नहीं है, उसको वह कैसे मिल सकता है। अतः पूर्व मन्त्रोंमें बतलायी हुई रीतिके अनुसार इन्द्रिय-मन आदि सबको योगाभ्यासके द्वारा रोककर 'वह अवश्य

१६६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

है और साधकको मिलता है' ऐसे दृढ़तम निश्चयसे निरन्तर उसकी प्राप्तिके लिये परम उत्कण्ठाके साथ प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥ १२ ॥

अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥

अस्ति=(अतः उस परमात्माको पहले तो) 'वह अवश्य है'; इति एव=इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धव्यः=ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् पहले उसके अस्तित्वका दृढ़ निश्चय करना चाहिये; [तदनु]=तदनन्तर; तत्त्वभावेन=तत्त्वभावसे भी; [उपलब्धव्यः]=उसे प्राप्त करना चाहिये; उभयोः=इन दोनों प्रकारोंमेंसे; अस्ति इति एव='वह अवश्य है' इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धस्य=परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेवाले साधकके लिये; तत्त्वभावः=परमात्माका तात्त्विक स्वरूप (अपने-आप); प्रसीदति=(शुद्ध हृदयमें) प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥

व्याख्या —साधकको चाहिये कि पहले तो वह इस बातका दृढ़ निश्चय करे कि 'परमेश्वर अवश्य हैं और वे साधकको अवश्य मिलते हैं'; फिर इसी विश्वाससे उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तात्त्विक विवेचनपूर्वक निरन्तर उनका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वाससे भगवान्को स्वीकार कर लेता है कि 'वे अवश्य हैं और अपने हृदयमें ही विराजमान हैं, उनकी प्राप्ति अवश्य होती है', तो परमात्माका वह तात्त्विक दिव्य स्वरूप उसके विशुद्ध हृदयमें अपने-आप प्रकट हो जाता है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध —अब निष्कामभावकी महिमा बतलाते हैं—

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥

अस्य=इस (साधक) के; हृदि श्रिताः=हृदयमें स्थित; ये कामाः=जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा=(वे) सब-की-सब जब; प्रमुच्यन्ते=समूल नष्ट हो जाती हैं; अथ=तब; मर्त्यः=मरणधर्मा मनुष्य; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता

वल्ली ३ ] कठोपनिषद् १६७

है (और); अत्र=(वह) यहीं; **ब्रह्म समश्नुते=**ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है॥ १४॥

**व्याख्या—**मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी ऐहलौकिक और पारलौकिक कामनाओंसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं; तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था—अमर हो जाता है और यहीं—इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है॥ १४॥

**सम्बन्ध—**संशयरहित दृढ़ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं—

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ १५॥

**यदा=**जब (इसको); **हृदयस्य=**हृदयकी; **सर्वे=**सम्पूर्ण; **ग्रन्थयः=**ग्रन्थियाँ; **प्रभिद्यन्ते=**भलीभाँति खुल जाती हैं; **अथ=**तब; **मर्त्यः=**वह मरणधर्मा मनुष्य; **इह=**इसी शरीरमें; **अमृतः=**अमर; **भवति=**हो जाता है; **हि एतावत्=**बस, इतना ही; **अनुशासनम्=**सनातन उपदेश है॥ १५॥

**व्याख्या—**जब साधकके हृदयकी अहंता-ममतारूप समस्त अज्ञान-ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकारके संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि 'परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं', तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है॥ १५॥

**सम्बन्ध—**अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं—

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।

१६८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २

तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥

हृदयस्य = हृदयकी; शतम् च एका च = (कुल मिलाकर) एक सौ एक; नाड्यः = नाड़ियाँ हैं; तासाम् = उनमेंसे; एका = एक; मूर्धानम् = मूर्धा (कपाल) की ओर; अभिनिःसृता = निकली हुई है (इसे ही सुषुम्णा कहते हैं); तया = उसके द्वारा; ऊर्ध्वम् = ऊपरके लोकोंमें; आयन् = जाकर (मनुष्य); अमृतत्वम् = अमृतभावको; एति = प्राप्त हो जाता है; अन्याः = दूसरी एक सौ नाड़ियाँ; उत्क्रमणे = मरणकालमें (जीवको); विष्वङ् = नाना प्रकारकी योनियोंमें ले जानेकी हेतु; भवन्ति = होती हैं ॥ १६ ॥

व्याख्या— हृदयमें एक सौ एक प्रधान नाड़ियाँ हैं, जो वहाँसे सब ओर फैली हुई हैं। उनमेंसे एक नाड़ी, जिसको सुषुम्णा कहते हैं, हृदयसे मस्तककी ओर गयी है। भगवान्‌के परमधाममें जानेका अधिकारी उस नाड़ीके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर सबसे ऊँचे लोकमें अर्थात् भगवान्‌के परमधाममें जाकर अमृतस्वरूप परमानन्दमय परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है; और दूसरे जीव मरणकालमें दूसरी नाड़ियोंके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर अपने-अपने कर्म और वासनाके अनुसार नाना योनियोंको प्राप्त होते हैं ॥ १६ ॥

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण तं विद्याच्छुक्रममृतं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥*

अन्तरात्मा = सबका अन्तर्यामी; अङ्गुष्ठमात्रः = अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुषः = परमपुरुष; सदा = सदैव; जनानाम् = मनुष्योंके; हृदये = हृदयमें; सन्निविष्टः = भलीभाँति प्रविष्ट है; तम् = उसको; मुञ्जात् = मूँजसे; इषीकाम् इव = सींककी भाँति; स्वात् = अपनेसे (और); शरीरात् = शरीरसे; धैर्येण = धीरतापूर्वक; प्रवृहेत् = पृथक् करके देखे;


* इसका पूर्वार्ध श्वेता० ३ । १३ के पूर्वार्धसे मिलता है।

बल्ली ३ ]

कठोपनिषद्

१६१

तम्=उसीको; शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे; तम् शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=(और) उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे ॥ १७ ॥

व्याख्या —सबके अन्तर््यामी परमपुरुष परमेश्वर हृदयके अनुरूप अङ्गुष्ठमात्र रूपवाले होकर सदैव सभी मनुष्योंके भीतर निवास करते हैं, तो भी मनुष्य उनकी ओर देखतातक नहीं। जो प्रमादरहित होकर उनकी प्राप्तिके साधनमें लगे हैं, उन मनुष्योंको चाहिये कि उन शरीरस्थ परमेश्वरको इस शरीरसे और अपने-आपसे भी उसी तरह पृथक् और विलक्षण समझें, जैसे साधारण लोग मूँजसे सीकको पृथक् देखते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मूँजमें रहनेवाली सीक मूँजसे विलक्षण और पृथक् है, उसी प्रकार वह शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाला परमेश्वर उन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है। वही विशुद्ध अमृत है, वही विशुद्ध अमृत है। यहाँ यह वाक्यकी पुनरावृत्ति उपदेशकी समाप्ति एवं सिद्धान्तकी निश्चितताको सूचित करती है ॥ १७ ॥

मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्। ब्रह्मप्राप्नो विरजोऽभूद्विमृत्यु- रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥

अथ=इस प्रकार उपदेश सुननेके अनन्तर; नचिकेतः=नचिकेता; मृत्युप्रोक्ताम्=यमराजद्वारा बतलायी हुई; एताम्=इस; विद्याम्=विद्याको; च=और; कृत्स्नम्=सम्पूर्ण; योगविधिम्=योगकी विधिको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; विमृत्युः=मृत्युसे रहित (और); विरजः [ सन् ]=सब प्रकारके विकारोंसे शून्य विशुद्ध होकर; ब्रह्मप्राप्तः अभूत्=ब्रह्मको प्राप्त हो गया; अन्यः अपि यः=दूसरा भी जो कोई; [ इदम् ] अध्यात्मम् एवंवित्=इस अध्यात्मविद्याको इसी प्रकार जाननेवाला है; [ सः अपि एवम् ] एव [ भवति ]=वह भी ऐसा ही हो जाता है अर्थात् मृत्यु और विकारोंसे रहित होकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥

व्याख्या —इस प्रकार यमराजके द्वारा उपदिष्ट समस्त विवेचनको श्रद्धापूर्वक

१७०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

सुननेके पश्चात् नचिकेता उनके द्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण विद्या और योगकी विधिको प्राप्त करके जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त, सब प्रकारके विकारोंसे रहित एवं सर्वथा विशुद्ध होकर परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो गया। दूसरा भी जो कोई इस अध्यात्मविद्याको इस प्रकार नचिकेताकी भाँति ठीक-ठीक जान लेता है और श्रद्धापूर्वक उसे धारण कर लेता है, वह भी नचिकेताकी भाँति सब विकारोंसे रहित तथा जन्म-मृत्युसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥

तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥ ( ६ )

द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

कृष्णयजुर्वेदीय कठेपनिषद् समाप्त

—●—●—●—

शान्तिपाठ

ॐ सह नावतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

इसका अर्थ इस उपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है।

—●—●—●—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्रश्नोपनिषद्

प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदके पिप्पलाद-शाखीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इस उपनिषदमें पिप्पलाद ऋषिने सुकेशा आदि छः ऋषियोंके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर दिया है; इसलिये इसका नाम प्रश्नोपनिषद् हो गया।

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्बज्राः ।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्ट्वाऽसस्तनूभिव्यशेम देवहितं यदायुः ॥*

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।

स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥†

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

देवाः=हे देवगण! [वयम्] यजत्राः [सन्तः]=हम भगवान्का यजन (आराधन) करते हुए; कर्णोभिः=कानोंसे; भद्रम्=कल्याणमय वचन; शृणुयाम=सुनें; अक्षभिः=नेत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही); पश्येम=देखें; स्थिरैः=सुदृढ़; अङ्गैः=अङ्गों; तनूभिः=एवं शरीरसे; तुष्ट्वांसः [वयम्]=भगवान्की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः=आयु; देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; [तत्]=उसका; व्यशेम=उपभोग करें; वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले; इन्द्रः=इन्द्र; नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें; विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले; पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [दधातु]=कल्याणका पोषण करें; अरिष्टनेमिः=अरिष्टोंको मिटानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली; ताक्ष्यः=गरुडदेव; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [दधातु]=कल्याणका पोषण करें;

  • † ये दोनों मन्त्र यजु० २५।२१,२५,१९; ऋग् १।८९।८,१।८९।६ में हैं।

१७२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न १ ]

(तथा) बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो।

व्याख्या —गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि ‘हे देवगण! हम अपने कानोंसे शुभ—कल्याणकारी वचन ही सुनें। निन्दा, चुगली, गाली या दूसरी-दूसरी पापकी बातें हमारे कानोंमें न पड़ें और हमारा अपना जीवन यजन-परायण हो—हम सदा भगवान्की आराधनामें ही लगे रहें। न केवल कानोंसे सुनें, नेत्रोंसे भी हम सदा कल्याणका ही दर्शन करें। किसी अमङ्गलकारी अथवा पतनकी ओर ले जानेवाले दृश्योंकी ओर हमारी दृष्टिका आकर्षण कभी न हो। हमारे शरीर, हमारा एक-एक अवयव सुदृढ़ एवं सुपुष्ट हो—वह भी इसलिये कि हम उनके द्वारा भगवान्का स्तवन करते रहें। हमारी आयु भोग-विलास या प्रमादमें न बीते। हमें ऐसी आयु मिले, जो भगवान्के कार्यमें आ सके। [देवता हमारी प्रत्येक इन्द्रियमें व्याप्त रहकर उसका संरक्षण और संचालन करते हैं। उनके अनुकूल रहनेसे हमारी इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक सन्मार्गमें लगी रह सकती हैं, अतः उनसे प्रार्थना करनी उचित ही है।] जिनका सुयश सब ओर फैला है, वे देवराज इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनिवारक ताक्ष्य (गरुड) और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति—ये सभी देवता भगवान्की दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सदा हमारे कल्याणका पोषण करें। इनकी कृपासे हमारे सहित प्राणिमात्रका कल्याण होता रहे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—सभी प्रकारके तापोंकी शान्ति हो।

प्रथम प्रश्न

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भीः कबन्धी कात्यायनस्ते ह्येते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्याणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७३


ॐ=ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; भारद्वाजः सुकेशा=भरद्वाज-पुत्र सुकेशा; च शैब्यः सत्यकामः=और शिविकुमार सत्यकाम; च गार्ग्यः सौर्यायणी=तथा गर्गगोत्रमें उत्पन्न सौर्यायणी; च कौसल्यः आश्वलायनः=एवं कोसलदेशीय आश्वलायन; च वैदर्भिः भार्गवः=तथा विदर्भनिवासी भार्गव; [ ] कात्यायनः कबन्धी=और कत्य ऋषिका प्रपौत्र कबन्धी; ते एते ह ब्रह्मपराः=वे ये छः प्रसिद्ध ऋषि, जो वेदपरायण (और); ब्रह्मनिष्ठाः=वेदमें निष्ठा रखनेवाले थे; ते ह=वे सब-के-सब; परम् ब्रह्म=परब्रह्मकी; अन्वेषमाणाः=खोज करते हुए; एषः ह वै तत् सर्वम् वक्ष्यति इति=यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्मके विषयमें सारी बातें बतायेंगे; समित्पाणयः=हाथमें समिधा लिये हुए; भगवन्तम् पिप्पलादम् उपसन्नाः=भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये॥ १॥

व्याख्या—ओंकारस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। प्रसिद्ध है कि भरद्वाजके पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्रमें उत्पन्न सौर्यायणी, कोसलदेश-निवासी आश्वलायन, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्यके प्रपौत्र कबन्धी—ये वेदाभ्यासके परायण और ब्रह्मनिष्ठ अर्थात् श्रद्धापूर्वक वेदानुकूल आचरण करनेवाले थे। एक बार ये छहों ऋषि परब्रह्म परमेश्वरकी जिज्ञासासे एक साथ बाहर निकले। इन्होंने सुना था कि पिप्पलाद ऋषि इस विषयको विशेषरूपसे जानते हैं; अतः यह सोचकर कि ‘परब्रह्मके सम्बन्धमें हम जो कुछ जानना चाहते हैं, वह सब वे हमें बता देंगे’ वे लोग जिज्ञासुके वेशमें हाथमें समिधा लिये हुए महर्षि पिप्पलादके पास गये॥ १॥

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

तान् सः ह=उन सुकेशा आदि ऋषियोंसे वे प्रसिद्ध; ऋषिः उवाच=(पिप्पलाद) ऋषि बोले—; भूयः एव=तुमलोग पुनः; श्रद्धया=श्रद्धाके साथ;

१७४ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १

ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए; (और) तपसा=तपस्यापूर्वक; संवत्सरम्=एक वर्षतक (यहाँ); संवत्स्यथ=भलीभाँति निवास करो; यथाकामम्=(उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार; प्रश्नान् पृच्छत=प्रश्न पूछना; यदि विज्ञास्यामः=यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; सर्वम्=तो निःसंदेह वे सब बातें; वः वक्ष्यामः इति=तुमलोगोंको बताऊँगा॥ २॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त छहों ऋषियोंको परब्रह्मकी जिज्ञासासे अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलादने उनसे कहा—तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़े हैं; तथापि मेरे आश्रममें रहकर पुनः एक वर्षतक श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तपश्चर्या करो। उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना। यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयका मुझे ज्ञान होगा तो निस्संदेह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बताऊँगा॥ २॥

**सम्बन्ध—**ऋषिके आज्ञानुसार सबने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्याके साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।

अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ।
भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति॥ ३॥

अथ=तदनन्तर (उनमेंसे); कात्यायनः कबन्धी=कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने; उपेत्य=(पिप्पलाद ऋषिके) पास जाकर; पप्रच्छ=पूछा—; भगवन्=भगवन्!; कुतः वै=किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारणविशेषसे; इमाः प्रजाः=यह सम्पूर्ण प्रजा; प्रजायन्ते=नाना रूपोंमें उत्पन्न होती है; इति=यह मेरा प्रश्न है॥ ३॥

**व्याख्या—**महर्षि पिप्पलादकी आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे। महर्षिकी देख-रेखमें संयमपूर्वक रहकर एक वर्षतक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया। उसके बाद वे सब पुनः पिप्पलाद ऋषिके पास गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने श्रद्धा और विनयपूर्वक पूछा—'भगवन्! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपोंमें उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है?'॥ ३॥

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७५


तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

तस्मै सः ह उवाच=उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले—; वै प्रजाकामः=निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाला (जो); प्रजापतिः=प्रजापति है; सः तपः अतप्यत=उसने तप किया; सः तपः तप्त्वा=उसने तपस्या करके (जब सृष्टिका आरम्भ किया, उस समय पहले); सः=उसने; रयिम् च=एक तो रयि तथा; प्राणम् च=दूसरा प्राण भी; इति मिथुनम्=यह जोड़ा; उत्पादयते=उत्पन्न किया; एतौ मे=(इन्हें उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि) ये दोनों मेरी; बहुधा=नाना प्रकारकी; प्रजाः=प्रजाओंको; करिष्यतः इति=उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥

व्याख्या—कबन्धी ऋषिका यह प्रश्न सुनकर महर्षि पिप्पलाद बोले—हे कात्यायन ! यह बात वेदोंमें प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी परमेश्वरको सृष्टिके आदिमें जब प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने संकल्पस्वरूप तप किया। तपसे उन्होंने सर्वप्रथम रयि और प्राण—इन दोनोंका एक जोड़ा उत्पन्न किया। उसे उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि ये दोनों मिलकर मेरे लिये नाना प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न करेंगे। इस मन्त्रमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली जो समष्टि जीवनी शक्ति है, उसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है। इस जीवनी शक्तिसे ही प्रकृतिके स्थूल स्वरूपमें—समस्त पदार्थोंमें जीवन, स्थिति और यथायोग्य सामञ्जस्य आता है एवं स्थूल भूत-समुदायका नाम 'रयि' रखा गया है, जो प्राणरूप जीवनी शक्तिसे अनुप्राणित होकर कार्यक्षम होता है। प्राण चेतना है, रयि शक्ति और आकृति है। प्राण और रयिके संयोगसे ही सृष्टिका समस्त कार्य सम्पन्न होता है। इन्हींको अन्यत्र अग्नि और सोमके नामसे भी कहा गया है॥ ४॥

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

१७६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १

ह=यह निश्चय है कि; आदित्यः वै=सूर्य ही; प्राणः=प्राण है (और); चन्द्रमाः एव=चन्द्रमा ही; रयिः=रयि है; यत् मूर्तम् च=जो कुछ आकारवाला है (पृथ्वी, जल और तेज); अमूर्तम् च=और जो आकाररहित है (आकाश और वायु); एतत् सर्वम् वै=यह सभी कुछ; रयिः=रयि है; तस्मात्=इसलिये; मूर्तिः एव=मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जाननेमें आनेवाली सभी वस्तुएँ; रयिः=रयि हैं॥ ५॥

व्याख्या— इस मन्त्रमें उपर्युक्त प्राण और रयिका स्वरूप समझाया गया है। पिप्पलाद कहते हैं कि यह दीखनेवाला सम्पूर्ण जगत् प्राण और रयि—इन दोनों तत्त्वोंके संयोग या सम्मिश्रणसे बना है; इसलिये यद्यपि इन्हें पृथक्-पृथक् करके नहीं बताया जा सकता, तथापि तुम इस प्रकार समझो—यह सूर्य, जो हमें प्रत्यक्ष दिखलायी देता है, यही प्राण है; क्योंकि इसीमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली चेतना-शक्तिकी प्रधानता और अधिकता है। यह सूर्य उस सूक्ष्म जीवनी शक्तिका घनीभूत स्वरूप है। उसी प्रकार यह चन्द्रमा ही ‘रयि’ है; क्योंकि इसमें स्थूल तत्त्वोंको पुष्ट करनेवाली भूत तन्मात्राओंकी ही अधिकता है। समस्त प्राणियोंके स्थूल शरीरोंका पोषण इस चन्द्रमाकी शक्तिको पाकर ही होता है। हमारे शरीरोंमें ये दोनों शक्तियाँ प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त हैं। उनमें जीवनी शक्तिका सम्बन्ध सूर्यसे है और मांस, मेद आदि स्थूल तत्त्वोंका सम्बन्ध चन्द्रमासे है॥ ५॥

अथादित्य उदयन्त्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६॥

अथ=रात्रिके अनन्तर; उदयन्=उदय होता हुआ; आदित्यः=सूर्य; यत् प्राचीम् दिशम्=जो पूर्व दिशामें; प्रविशति=प्रवेश करता है; तेन प्राच्यान् प्राणान्=उससे पूर्व दिशाके प्राणोंको; रश्मिषु=अपनी किरणोंमें; संनिधत्ते=धारण करता है (उसी

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७७

प्रकार); यत् दक्षिणाम्=जो दक्षिण दिशाको; यत् प्रतीचीम्=जो पश्चिम दिशाको; यत् उदीचीम्=जो उत्तर दिशाको; यत् अधः=जो नीचेके लोकोंको; यत् ऊर्ध्वम्=जो ऊपरके लोकोंको; यत् अन्तरा दिशः=जो दिशाओंके बीचके भागों (कोणों) को (और); यत् सर्वम्=जो अन्य सबको; प्रकाशयति=प्रकाशित करता है; तेन सर्वान् प्राणान्=उससे समस्त प्राणोंको अर्थात् सम्पूर्ण जगत्के प्राणोंको; रश्मिषु संनिधत्ते=अपनी किरणोंमें धारण करता है॥ ६॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें जो जीवनी शक्ति है, उसके साथ सूर्यका सम्बन्ध दिखलाया गया है। भाव यह है कि रात्रिके बाद जब सूर्य उदय होकर पूर्वदिशामें अपना प्रकाश फैलाता है, उस समय वहाँके प्राणियोंके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है अर्थात् उनकी जीवनी शक्तिका सूर्यकी किरणोंसे सम्बन्ध होकर उसमें नवीन स्फूर्ति आ जाती है। उसी प्रकार जिस समय जिस दिशामें जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँके प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियोंका प्राण है॥ ६॥

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते। तदेतदृचाभ्युक्तम्॥ ७॥

सः एषः=वह यह सूर्य ही; उदयते=उदय होता है; वैश्वानरः अग्निः=(जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) (और); विश्वरूपः प्राणः=विश्वरूप प्राण है; तत् एतत्=वही यह बात; ऋचा=ऋचाद्वारा; अभ्युक्तम्=आगे कही गयी है॥ ७॥

**व्याख्या—**प्राणियोंके शरीरमें जो वैश्वानर नामसे कही जानेवाली जठराग्नि है, जिससे अन्नका पाचन होता है (गीता १५। १४), वह सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचाद्वारा समझायी गयी है॥ ७॥

१७८ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न १

$$\begin{aligned} \text{विश्वरूपं} & \quad\quad \text{हरिणं} \quad\quad \text{जातवेदसं} \ & \text{परायणं} \quad\quad \text{ज्योतिरेकं} \quad\quad \text{तपन्तम्।} \ \text{सहस्ररश्मिः} & \quad\quad \text{शतधा} \quad\quad \text{वर्तमानः} \ & \text{प्राणः} \quad\quad \text{प्रजानामुदयत्येष} \quad\quad \text{सूर्यः॥ ८॥} \end{aligned}$$

विश्वरूपम्=सम्पूर्ण रूपोंके केन्द्र; जातवेदसम्=सर्वज्ञ; परायणम्=सर्वाधार; ज्योतिः=प्रकाशमय; तपन्तम्=तपते हुए; हरिणम्=किरणोंवाले सूर्यको; एकम्=अद्वितीय (बतलाते हैं); एषः=यह; सहस्ररश्मिः=सहस्रों किरणोंवाला; सूर्यः=सूर्य; शतधा वर्तमानः=सैकड़ों प्रकारसे वर्तता हुआ; प्रजानाम्=समस्त जीवोंका; प्राणः=प्राण (जीवनदाता) होकर; उदयति=उदय होता है॥ ८॥

**व्याख्या—**इस सूर्यके तत्त्वको जाननेवालोंका कहना है कि यह किरण-जालसे मण्डित एवं प्रकाशमय, तपता हुआ सूर्य विश्वके समस्त रूपोंका केन्द्र है। सभी रूप (रंग और आकृतियाँ) सूर्यसे उत्पन्न और प्रकाशित होते हैं। यह सविता ही सबका उत्पत्तिस्थान है और यही सबकी जीवन-ज्योतिका मूल स्रोत है। यह सर्वज्ञ और सर्वाधार है, वैश्वानर अग्नि और प्राण-शक्तिके रूपमें सर्वत्र व्याप्त है और सबको धारण किये हुए है। समस्त जगत्‌का प्राणरूप सूर्य एक ही है—इसके समान इस जगत्‌में दूसरी कोई भी जीवनी शक्ति नहीं है। यह सहस्रों किरणोंवाला सूर्य हमारे सैकड़ों प्रकारके व्यवहार सिद्ध करता हुआ उदय होता है। जगत्‌में उष्णता और प्रकाश फैलाना, सबको जीवन प्रदान करना, ऋतुओंका परिवर्तन करना आदि हमारी सैकड़ों प्रकारकी आवश्यकताओंको पूर्ण करता हुआ सम्पूर्ण सृष्टिका जीवनदाता प्राण ही सूर्यके रूपमें उदित होता है॥ ८॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार यहाँतक कात्यायन कबन्धीके प्रश्नानुसार संक्षेपमें यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे ही उसके संकल्पद्वारा प्राण और रयिके संयोगसे इस सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राणशक्ति और रयिशक्तिके सम्बन्धसे परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलानेके लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७९

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च तद्ये ह वै तदिष्टাপૂર્ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥

संवत्सरः वै=संवत्सर (बारह महीनोंवाला काल) ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य अयने=उसके दो अयन हैं—; दक्षिणम् च=एक दक्षिण और; उत्तरम् च=दूसरा उत्तर; तत् ये ह=वहाँ मनुष्योंमें जो लोग निश्चयपूर्वक; तत् इष्टापूर्ते वै=(केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही; कृतम् इति=करनेयोग्य कर्म मानकर (सकाम भावसे); उपासते=उनकी उपासना करते हैं (उन्हींके अनुष्ठानमें लगे रहते हैं); ते चान्द्रमसम्=वे चन्द्रमाके; लोकम् एव=लोकको ही; अभिजयन्ते=जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और); ते एव=वे ही; पुनः आवर्तन्ते=पुनः (वहाँसे) लौटकर आते हैं; तस्मात् एते=इसलिये ये; प्रजाकामाः ऋषयः=संतानकी कामनावाले ऋषिगण; दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते=दक्षिण (मार्ग)-को प्राप्त होते हैं; ह एषः वै रयिः=निस्संदेह यही वह रयि है; यः पितृयाणः=जो 'पितृयान' नामक मार्ग है॥ ९॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें संवत्सरको परमात्माका प्रतीक बनाकर उसके अङ्गरूप रयिस्थानीय भोग्य-पदार्थोंके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासना और उसका फल बताते हैं। भाव यह है कि बारह महीनोंका यह संवत्सररूप काल ही मानो सृष्टिके स्वामी परमेश्वरका स्वरूप है। इसके दो अयन हैं— दक्षिण और उत्तर। दक्षिणायनके जो छः महीने हैं, जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर घूमता है—ये मानो इसके दक्षिण अङ्ग हैं और उत्तरायणके छः महीने ही उत्तर अङ्ग हैं। उनमें उत्तर अङ्ग तो प्राण है, इस विश्वके आत्मारूप उस परमेश्वरका सर्वान्तर्यामी स्वरूप है और दक्षिण अङ्ग रयि अर्थात् उसका बाह्य भोग्यस्वरूप है। इस जगत्में जो संतानकी कामनावाले ऋषि स्वर्गादि सांसारिक भोगोंमें आसक्त हैं, वे यज्ञादिद्वारा देवताओंका पूजन करना, ब्राह्मण

१८० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १


एवं श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दुःखी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको उत्कृष्ट कर्तव्य समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं; यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं; यही पितृयाण मार्ग है॥ ९॥

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्या-
दित्यमभिजproperty.. wait: दित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायण-
मेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः॥ १०॥

अथ=किंतु (जो); तपसा=तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया=श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया=अध्यात्मविद्याके द्वारा, आत्मानम्=परमात्माकी; अन्विष्य=खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण=उत्तरायण-मार्गसे; आदित्यम्=सूर्यलोकको; अभिजयन्ते=जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं); एतत् वै=यह (सूर्य) ही; प्राणानाम्=प्राणोंका; आयतनम्=केन्द्र है; एतत् अमृतम्=यह अमृत (अविनाशी) (और); अभयम्=निर्भय पद है; एतत् परायणम्=यह परमगति है; एतस्मात्=इससे; न पुनः आवर्तन्ते=पुनः लौटकर नहीं आते; इति एषः=इस प्रकार यह; निरोधः=निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है; तत् एषः=(इस बातको स्पष्ट करनेवाला) यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए संयमके

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८१

साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमें जाकर सूर्यके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही उपर्युक्त महिमा कही गयी है। इसी बातको अगले मन्त्रमें स्पष्ट किया गया है॥ १०॥

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्।
अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥*

(कितने ही लोग तो इस सूर्यको); **पञ्चपादम्=**पाँच चरणोंवाला; **पितरम्=**सबका पिता; **द्वादशाकृतिम्=**बारह आकृतियोंवाला; **पुरीषिणम्=**जलका उत्पादक; दिवः परे अर्धे=(और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित); **आहुः=**बतलाते हैं; **अथ इमे=**तथा ये; **अन्ये उ=**दूसरे कितने ही लोग; **इति आहुः=**ऐसा बतलाते हैं (कि यह); **परे=**विशुद्ध; **सप्तचक्रे=**सात पहियोंवाले (और); **षडरे=**छः अरोंवाले (रथमें); **अर्पितम्=**बैठा हुआ (एवं); **विचक्षणम्=**सबको भलीभाँति जाननेवाला है॥ ११॥

**व्याख्या—**परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचरस्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छः ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको वे इस


* यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का बारहवाँ तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का बारहवाँ है।

१८२ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न १

सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियाँ अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अतः सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात रंगोंकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छः ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें— जिसे सात चक्र एवं छः अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है॥ ११॥

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

मासः वै=महीना ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य=उसका; कृष्णपक्षः एव=कृष्णपक्ष ही; रयिः=रयि है (और); शुक्लः प्राणः=शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात्=इसलिये; एते ऋषयः=ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले=शुक्लपक्षमें (निष्कामभावसे); इष्टम्=यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति=किया करते हैं (तथा); इतरे=दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन्=दूसरे पक्षमें—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं) ॥ १२ ॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापति परमेश्वरका रूप देकर कर्मोंद्वारा उसकी उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूल भूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है और शुक्लपक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात्

प्रश्न १ ]

प्रश्नोपनिषद्

१८३

जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्मको चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभकर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं, अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके कहते हैं—स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमें अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें ‘स्वर्गपराः’ के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४) ॥ १२ ॥

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यज्ञात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

अहोरात्रः वै=दिन और रातका जोड़ा ही; प्रजापतिः =प्रजापति है; तस्य =उसका; अहः एव =दिन ही; प्राणः =प्राण है (और); रात्रिः एव =रात्रि ही; रयिः =रयि है; ये दिवा =(अतः) जो दिनमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करते हैं; एते =ये लोग; वै प्राणम् =सचमुच अपने प्राणोंको ही; प्रस्कन्दन्ति =क्षीण करते हैं (तथा); यत् रात्रौ =जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करता है; तत् ब्रह्मचर्यम् एव =वह ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटोंके कालरूपमें परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोंपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अतः जो मनुष्य दिनमें स्त्री-प्रसंग करते हैं अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसंग आदि विलासमें आसक्त हो जाते हैं, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सांसारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके