ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८१
साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमें जाकर सूर्यके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही उपर्युक्त महिमा कही गयी है। इसी बातको अगले मन्त्रमें स्पष्ट किया गया है॥ १०॥
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्।
अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥*
(कितने ही लोग तो इस सूर्यको); **पञ्चपादम्=**पाँच चरणोंवाला; **पितरम्=**सबका पिता; **द्वादशाकृतिम्=**बारह आकृतियोंवाला; **पुरीषिणम्=**जलका उत्पादक; दिवः परे अर्धे=(और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित); **आहुः=**बतलाते हैं; **अथ इमे=**तथा ये; **अन्ये उ=**दूसरे कितने ही लोग; **इति आहुः=**ऐसा बतलाते हैं (कि यह); **परे=**विशुद्ध; **सप्तचक्रे=**सात पहियोंवाले (और); **षडरे=**छः अरोंवाले (रथमें); **अर्पितम्=**बैठा हुआ (एवं); **विचक्षणम्=**सबको भलीभाँति जाननेवाला है॥ ११॥
**व्याख्या—**परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचरस्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छः ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको वे इस
* यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का बारहवाँ तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का बारहवाँ है।