भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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१८० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १


एवं श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दुःखी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको उत्कृष्ट कर्तव्य समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं; यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं; यही पितृयाण मार्ग है॥ ९॥

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्या-
दित्यमभिजproperty.. wait: दित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायण-
मेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः॥ १०॥

अथ=किंतु (जो); तपसा=तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया=श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया=अध्यात्मविद्याके द्वारा, आत्मानम्=परमात्माकी; अन्विष्य=खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण=उत्तरायण-मार्गसे; आदित्यम्=सूर्यलोकको; अभिजयन्ते=जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं); एतत् वै=यह (सूर्य) ही; प्राणानाम्=प्राणोंका; आयतनम्=केन्द्र है; एतत् अमृतम्=यह अमृत (अविनाशी) (और); अभयम्=निर्भय पद है; एतत् परायणम्=यह परमगति है; एतस्मात्=इससे; न पुनः आवर्तन्ते=पुनः लौटकर नहीं आते; इति एषः=इस प्रकार यह; निरोधः=निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है; तत् एषः=(इस बातको स्पष्ट करनेवाला) यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए संयमके