ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८२ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न १ |
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सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियाँ अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अतः सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात रंगोंकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छः ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें— जिसे सात चक्र एवं छः अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है॥ ११॥
मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥
मासः वै=महीना ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य=उसका; कृष्णपक्षः एव=कृष्णपक्ष ही; रयिः=रयि है (और); शुक्लः प्राणः=शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात्=इसलिये; एते ऋषयः=ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले=शुक्लपक्षमें (निष्कामभावसे); इष्टम्=यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति=किया करते हैं (तथा); इतरे=दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन्=दूसरे पक्षमें—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं) ॥ १२ ॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापति परमेश्वरका रूप देकर कर्मोंद्वारा उसकी उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूल भूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है और शुक्लपक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात्