ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 548 में से
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प्रश्नोपनिषद्
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जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्मको चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभकर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं, अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके कहते हैं—स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमें अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें ‘स्वर्गपराः’ के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४) ॥ १२ ॥
अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यज्ञात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥
अहोरात्रः वै=दिन और रातका जोड़ा ही; प्रजापतिः =प्रजापति है; तस्य =उसका; अहः एव =दिन ही; प्राणः =प्राण है (और); रात्रिः एव =रात्रि ही; रयिः =रयि है; ये दिवा =(अतः) जो दिनमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करते हैं; एते =ये लोग; वै प्राणम् =सचमुच अपने प्राणोंको ही; प्रस्कन्दन्ति =क्षीण करते हैं (तथा); यत् रात्रौ =जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करता है; तत् ब्रह्मचर्यम् एव =वह ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटोंके कालरूपमें परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोंपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अतः जो मनुष्य दिनमें स्त्री-प्रसंग करते हैं अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसंग आदि विलासमें आसक्त हो जाते हैं, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सांसारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके