ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न १ ]
नियमानुसार ऋतुकालमें रात्रिके समय नियमानुकूल स्त्री-प्रसङ्ग करते हैं तो वे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करनेके कारण ब्रह्मचारीके तुल्य ही हैं। लौकिक दृष्टिसे यों कह सकते हैं कि इस मन्त्रमें गृहस्थोंको दिनमें स्त्री-प्रसंग कदापि न करनेका और विहित रात्रियोंमें शास्त्रानुसार नियमित और संयमित-रूपमें केवल संतानकी इच्छासे स्त्री-सहवास करनेका उपदेश दिया गया है। तभी वह ब्रह्मचर्यकी गणनामें आ सकता है* ॥ १३ ॥
अत्रं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥
अत्रम् वै=अत्र ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; ह ततः वै=क्योंकि उसीसे; तत् रेतः=वह वीर्य (उत्पन्न होता है); तस्मात्=उस वीर्यसे; इमाः प्रजाः=ये सम्पूर्ण चराचर प्राणी; प्रजायन्ते इति=उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें अत्रको प्रजापतिका स्वरूप बताकर अत्रकी महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि यह सब प्राणियोंका आहाररूप अत्र ही प्रजापति है; क्योंकि इसीसे वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्यसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस कारण इस अत्रको भी प्रकारान्तरसे प्रजापति माना गया है ॥ १४ ॥
सम्बन्ध— अब पहले बतलाये हुए दो प्रकारके साधकोंको मिलनेवाले पृथक्-पृथक् फलका वर्णन करते हैं—
तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
तत् ये ह वै=जो कोई भी निश्चयपूर्वक; तत् प्रजापतिव्रतम्=उस प्रजापति-
- रजोदर्शनके दिनसे लेकर सोलाह दिनोंतक स्वाभाविक ऋतुकाल कहलाता है। इनमें पहली चार रात्रियाँ तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियाँ सर्वथा वर्जित हैं। शेष दस रात्रियोंमें पर्व (एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, व्यतिपात, संक्रान्ति, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी आदि) दिनोंको छोड़कर पत्नीकी रतिकामनासे जो पुरुष महीनेमें केवल दो रात्रि स्त्री-सहवास करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ ही ब्रह्मचारी माना जाता है (मनुस्मृति ३।४५-४७, ५०)