ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८५
व्रतका; चरन्ति=अनुष्ठान करते हैं; ते मिथुनम्=वे जोड़ेको; उत्पादयन्ते=उत्पन्न करते हैं; येषाम् तपः=जिनमें तप (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य (है); येषु सत्यम्=जिनमें सत्य; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; तेषाम् एव=उन्हींको; एषः ब्रह्मलोकः=यह ब्रह्मलोक मिलता है॥ १५॥
व्याख्या— जो लोग संतानोत्पत्तिरूप प्रजापतिके व्रतका अनुष्ठान करते हैं अर्थात् स्वर्गादि लोकोंके भोगकी प्राप्तिके लिये शास्त्रविहित शुभकर्मोंका आचरण करते हुए नियमानुसार स्त्री-प्रसङ्ग आदि भोगोंका उपभोग करते हैं, वे तो पुत्र और कन्यारूप जोड़ेको उत्पन्न करके प्रजाकी वृद्धि करते हैं और जो उनसे भिन्न हैं, जिनमें ब्रह्मचर्य और तप भरा हुआ है, जिनका जीवन सत्यमय है तथा जो सत्यस्वरूप परमेश्वरको अपने हृदयमें नित्य स्थित देखते हैं, उन्हींको वह ब्रह्मलोक (परमपद, परमगति) मिलता है, दूसरोंको नहीं॥ १५॥
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥
येषु न=जिनमें न तो; जिह्मम्=कुटिलता (और); अनृतम्=झूठ है; च न=तथा न; माया=माया (कपट) ही है; तेषाम्=उन्हींको; असौ=वह; विरजः=विकाररहित, विशुद्ध; ब्रह्मलोकः इति=ब्रह्मलोक (मिलता है) ॥ १६॥
व्याख्या— जिनमें कुटिलताका लेश भी नहीं है, जो स्वप्नमें भी मिथ्याभाषण नहीं करते और असत्यमय आचरणसे सदा दूर रहते हैं, जिनमें राग-द्वेषादि विकारोंका सर्वथा अभाव है, जो सब प्रकारके छल-कपटसे शून्य हैं, उन्हींको वह विकाररहित विशुद्ध ब्रह्मलोक मिलता है। जो इनसे विपरीत लक्षणोंवाले हैं, उनको नहीं मिलता॥ १६॥
॥ प्रथम प्रश्न समाप्त १ ॥