ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय प्रश्न
अथ हैनँ भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
अथ ह एनम् = इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषिसे; वैदर्भिः भार्गवः = विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ = पूछा; भगवन् = भगवन्!; कति देवाः एव = कुल कितने देवता; प्रजां विधारयन्ते = प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत् = उनमेंसे कौन-कौन इसे; प्रकाशयन्ते = प्रकाशित करते हैं; पुनः = फिर (यह भी बतलाइये कि); एषाम् = इन सबमें; कः = कौन; वरिष्ठः = सर्वश्रेष्ठ है; इति = यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें भार्गव ऋषिने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं— (१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं? (२) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं? (३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है? ॥ १॥
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च। ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
सः ह = उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने; तस्मै उवाच = उन भार्गवसे कहा; ह आकाशः वै = निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश; एषः देवः = यह देवता है (तथा); वायुः = वायु; अग्निः = अग्नि; आपः = जल; पृथिवी = पृथिवी; वाक् = वाणी (कर्मेन्द्रियाँ); चक्षुः च श्रोत्रम् मनः = नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्रियाँ) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]; ते प्रकाश्य = वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते; अभिवदन्ति = अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम् = हमने इस शरीरको; अवष्टभ्य = आश्रय देकर; विधारयामः = धारण कर रखा है ॥ २॥
व्याख्या—इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं। यहाँ