ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८७
दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है; परन्तु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हींसे बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण—ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं। ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है'॥ २ ॥
तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥
तान्=उनसे; वरिष्ठः प्राणः=सर्वश्रेष्ठ प्राण; उवाच=बोला; मोहम्=(तुमलोग) मोहमें; मा आपद्यथ=न पड़ो; अहम् एव=मैं ही; एतत् आत्मानम्=अपने इस स्वरूपको; पञ्चधा प्रविभज्य=पाँच भागोंमें विभक्त करके; एतत् बाणम्=इस शरीरको; अवष्टभ्य=आश्रय देकर; विधारयामि=धारण करता हूँ; इति ते=यह (सुनकर भी) वे; अश्रद्दधानाः=अविश्वासी ही; बभूवुः=बने रहे॥ ३॥
**व्याख्या—**इस प्रकार जब सम्पूर्ण महाभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-रूप देवता परस्पर विवाद करने लगे, तब सर्वश्रेष्ठ प्राणने उनसे कहा—'तुमलोग अज्ञानवश आपसमें विवाद मत करो; तुममेंसे किसीमें भी इस शरीरको धारण करने या सुरक्षित रखनेकी शक्ति नहीं है। इसे तो मैंने ही अपनेको (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदानरूप) पाँच भागोंमें विभक्त करके आश्रय देते हुए धारण कर रखा है और मुझसे ही यह सुरक्षित है।' प्राणकी यह बात सुनकर भी उन देवताओंने उसपर विश्वास नहीं किया, वे अविश्वासी ही बने रहे॥ ३॥