ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २
सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते। तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति॥४॥
सः=(तब) वह प्राण; अभिमानात्=अभिमानपूर्वक; ऊर्ध्वम् उत्क्रमते इव=मानो (उस शरीरसे) ऊपरकी ओर बाहर निकलने लगा; तस्मिन् उत्क्रामति=उसके बाहर निकलनेपर; अथ इतरे सर्वे एव=उसीके साथ-ही-साथ अन्य सब भी; उत्क्रामन्ते=शरीरसे बाहर निकलने लगे; च=और; तस्मिन् प्रतिष्ठमाने=उसके ठहर जानेपर; सर्वे एव प्रातिष्ठन्ते=दूसरे सब देवता भी ठहर गये; तत् यथा=तब जैसे (मधुके छत्तेसे); मधुकरराजानम्=मधुमक्खियोंके राजाके; उत्क्रामन्तम्=निकलनेपर (उसीके साथ-साथ); सर्वाः एव=सारी ही; मक्षिकाः=मधुमक्खियाँ; उत्क्रामन्ते= बाहर निकल जाती हैं; च तस्मिन्=और उसके; प्रतिष्ठमाने=बैठ जानेपर; सर्वाः एव=सब-की-सब; प्रातिष्ठन्ते=बैठ जाती हैं; एवम्=ऐसी ही दशा (इन सबकी हुई); वाक् चक्षुः श्रोत्रम् च मनः=अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन; ते=वे (सभी); प्रीताः प्राणम् स्तुन्वन्ति=प्राणकी श्रेष्ठताका अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राणकी स्तुति करने लगे॥४॥
व्याख्या—तब उनको अपना प्रभाव दिखलाकर सावधान करनेके लिये वह सर्वश्रेष्ठ प्राण अभिमानमें ठेस लगनेसे मानो रूठकर इस शरीरसे बाहर निकलनेके लिये ऊपरकी ओर उठने लगा। फिर तो सब-के-सब देवता विवश होकर उसीके साथ बाहर निकलने लगे; कोई भी स्थिर नहीं रह सका। जब वह अपने स्थानपर स्थित हो गया, तब अन्य सब भी स्थित हो गये। जैसे मधुमक्खियोंका राजा जब अपने स्थानसे उड़ता है, तब उसके साथ ही वहाँ बैठी हुई अन्य सब मधुमक्खियाँ भी उड़ जाती हैं और जब वह बैठ जाता है तब अन्य सब भी बैठ जाती हैं, ऐसी ही दशा इन सब वागादि देवताओंकी भी