भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८९

हुई। यह देखकर वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि सब इन्द्रियोंको और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंको भी यह विश्वास हो गया कि हम सबमें प्राण ही श्रेष्ठ है; अतः वे सब प्रसन्नतापूर्वक निम्न प्रकारसे प्राणकी स्तुति करने लगे॥ ४॥

सम्बन्ध— प्राणको ही परब्रह्म परमेश्वरका स्वरूप मानकर उपासना करनेके लिये उसका सर्वात्मरूपसे महत्त्व बतलाया जाता है—*

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत्॥ ५॥

एषः अग्निः तपति=यह प्राण अग्निरूपसे तपता है; एषः सूर्यः=यही सूर्य है; एषः पर्जन्यः=यही मेघ है; [एषः] मघवान्=यही इन्द्र है; एषः वायुः=यही वायु है (तथा); एषः देवः=यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी=पृथ्‍वी (एवं); रयिः=रयि है (तथा); यत्=जो कुछ; सत्=सत्; =और; असत्=असत् है; =तथा; [यत्]=जो; अमृतम्=अमृत कहा जाता है (वह भी प्राण ही है)॥ ५॥

**व्याख्या—**वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है॥ ५॥

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥ ६॥

रथनाभौ=रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव=अरोंकी भाँति; ऋचः=ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ; यजूंषि=यजुर्वेदके मन्त्र (तथा); सामानि=सामवेदके मन्त्र; यज्ञः च=यज्ञ और; ब्रह्म क्षत्रम्=(यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम्=ये सब-के-सब; प्राणे=(इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हैं॥ ६॥


* इस विषयका वर्णन अथर्ववेद काण्ड ११ सू० ४ में विस्तारपूर्वक आया है।

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