ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९० | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न २ |
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व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का-सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के-सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है॥ ६॥
सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि॥ ७॥
**प्राण=**हे प्राण!; **त्वम् एव=**तू ही; **प्रजापतिः=**प्रजापति है; [त्वम् एव]=तू ही; **गर्भे चरसि=**गर्भमें विचरता है; प्रतिजायसे=(और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है; **तु=**निश्चय ही; **इमाः=**ये सब; **प्रजाः=**प्राणी; **तुभ्यम्=**तुझे; **बलिम् हरन्ति=**भेंट समर्पण करते हैं; **यः=**जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि=(अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है॥ ७॥
व्याख्या— हे प्राण! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है। ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं। भाव यह कि तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीरमें स्थित हो रहा है॥ ७॥
देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि॥ ८॥
(हे प्राण!) देवानाम्=(तू) देवताओंके लिये; **वह्नितमः=**उत्तम अग्नि; **असि=**है; **पितॄणाम्=**पितरोंके लिये; **प्रथमा स्वधा=**पहली स्वधा है; **अथर्वाङ्गिरसाम्=**अथर्वाङ्गिरस आदि; **ऋषीणाम्=**ऋषियोंके द्वारा; चरितम्= आचरित; **सत्यम्=**सत्य; **असि=**है॥ ८॥
व्याख्या— हे प्राण! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम