भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १११


अग्नि है। पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है॥ ८॥

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः॥ ९॥

प्राण=हे प्राण!; त्वम् तेजसा=तू तेजसे (सम्पन्न); इन्द्रः=इन्द्र; रुद्रः=रुद्र (और); परिरक्षिता=रक्षा करनेवाला; असि=है; त्वम्=तू ही; अन्तरिक्षे=अन्तरिक्षमें; चरसि=विचरता है (और); त्वम्=तू ही; ज्योतिषां पतिः=समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः=सूर्य है॥ ९॥

**व्याख्या—**हे प्राण! तू सब प्रकारके तेज (शक्तियों)-से सम्पन्न तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र है। तू ही प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है॥ ९॥

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति॥ १०॥

प्राण=हे प्राण!; यदा त्वम्=जब तू; अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय; ते इमाः प्रजाः=तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा; कामाय=यथेष्ट; अन्नम्=अन्न; भविष्यति=उत्पन्न होगा; इति=यह समझकर; आनन्दरूपाः=आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है॥ १०॥

**व्याख्या—**हे प्राण! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमें सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवन-निर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमें मग्न हो जाती है॥ १०॥

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः॥ ११॥

प्राण=हे प्राण!; त्वम्=तू; व्रात्यः=संस्काररहित (होते हुए भी); एकर्षिः=एकमात्र