ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २
सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तथा); वयम्=हमलोग (तेरे लिये); आद्यस्य=भोजनको; दातारः=देनेवाले हैं (और तू); अत्ता=भोक्ता (खानेवाला) है; विश्वस्य=समस्त जगत्का; सत्पतिः=(तू ही) श्रेष्ठ स्वामी है; मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले प्राण!; त्वम्=तू; नः=हमारा; पिता=पिता है॥ ११॥
**व्याख्या—**हे प्राण! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है; प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग (सब इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है। हे आकाशचारी समष्टिवायुरूप प्राण! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है॥ ११॥
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि। या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२॥
(हे प्राण!) या ते तनूः=जो तेरा स्वरूप; वाचि=वाणीमें; प्रतिष्ठिता=स्थित है; च=तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें; या चक्षुषि=जो चक्षुमें; च=और; या मनसि=जो मनमें; सन्तता=व्यास है; ताम्=उसको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; मा उत्क्रमीः=(तू) उत्क्रमण न कर॥ १२॥
**व्याख्या—**हे प्राण! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें व्यास है, उसे तू कल्याणमय बना ले। अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेश आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा। यह हमलोगोंकी प्रार्थना है॥ १२॥
प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३॥
इदम्=यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् (और); यत् त्रिदिवे=जो कुछ स्वर्गलोकमें; प्रतिष्ठितम्=स्थित है; सर्वम्=वह सब-का-सब; प्राणस्य=प्राणके;