ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
द्वितीय प्रश्न
अथ हैनँ भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
अथ ह एनम् = इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषिसे; वैदर्भिः भार्गवः = विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ = पूछा; भगवन् = भगवन्!; कति देवाः एव = कुल कितने देवता; प्रजां विधारयन्ते = प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत् = उनमेंसे कौन-कौन इसे; प्रकाशयन्ते = प्रकाशित करते हैं; पुनः = फिर (यह भी बतलाइये कि); एषाम् = इन सबमें; कः = कौन; वरिष्ठः = सर्वश्रेष्ठ है; इति = यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें भार्गव ऋषिने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं— (१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं? (२) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं? (३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है? ॥ १॥
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च। ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
सः ह = उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने; तस्मै उवाच = उन भार्गवसे कहा; ह आकाशः वै = निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश; एषः देवः = यह देवता है (तथा); वायुः = वायु; अग्निः = अग्नि; आपः = जल; पृथिवी = पृथिवी; वाक् = वाणी (कर्मेन्द्रियाँ); चक्षुः च श्रोत्रम् मनः = नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्रियाँ) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]; ते प्रकाश्य = वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते; अभिवदन्ति = अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम् = हमने इस शरीरको; अवष्टभ्य = आश्रय देकर; विधारयामः = धारण कर रखा है ॥ २॥
व्याख्या—इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं। यहाँ
प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८७
दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है; परन्तु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हींसे बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण—ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं। ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है'॥ २ ॥
तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥
तान्=उनसे; वरिष्ठः प्राणः=सर्वश्रेष्ठ प्राण; उवाच=बोला; मोहम्=(तुमलोग) मोहमें; मा आपद्यथ=न पड़ो; अहम् एव=मैं ही; एतत् आत्मानम्=अपने इस स्वरूपको; पञ्चधा प्रविभज्य=पाँच भागोंमें विभक्त करके; एतत् बाणम्=इस शरीरको; अवष्टभ्य=आश्रय देकर; विधारयामि=धारण करता हूँ; इति ते=यह (सुनकर भी) वे; अश्रद्दधानाः=अविश्वासी ही; बभूवुः=बने रहे॥ ३॥
**व्याख्या—**इस प्रकार जब सम्पूर्ण महाभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-रूप देवता परस्पर विवाद करने लगे, तब सर्वश्रेष्ठ प्राणने उनसे कहा—'तुमलोग अज्ञानवश आपसमें विवाद मत करो; तुममेंसे किसीमें भी इस शरीरको धारण करने या सुरक्षित रखनेकी शक्ति नहीं है। इसे तो मैंने ही अपनेको (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदानरूप) पाँच भागोंमें विभक्त करके आश्रय देते हुए धारण कर रखा है और मुझसे ही यह सुरक्षित है।' प्राणकी यह बात सुनकर भी उन देवताओंने उसपर विश्वास नहीं किया, वे अविश्वासी ही बने रहे॥ ३॥
१८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २
सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते। तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति॥४॥
सः=(तब) वह प्राण; अभिमानात्=अभिमानपूर्वक; ऊर्ध्वम् उत्क्रमते इव=मानो (उस शरीरसे) ऊपरकी ओर बाहर निकलने लगा; तस्मिन् उत्क्रामति=उसके बाहर निकलनेपर; अथ इतरे सर्वे एव=उसीके साथ-ही-साथ अन्य सब भी; उत्क्रामन्ते=शरीरसे बाहर निकलने लगे; च=और; तस्मिन् प्रतिष्ठमाने=उसके ठहर जानेपर; सर्वे एव प्रातिष्ठन्ते=दूसरे सब देवता भी ठहर गये; तत् यथा=तब जैसे (मधुके छत्तेसे); मधुकरराजानम्=मधुमक्खियोंके राजाके; उत्क्रामन्तम्=निकलनेपर (उसीके साथ-साथ); सर्वाः एव=सारी ही; मक्षिकाः=मधुमक्खियाँ; उत्क्रामन्ते= बाहर निकल जाती हैं; च तस्मिन्=और उसके; प्रतिष्ठमाने=बैठ जानेपर; सर्वाः एव=सब-की-सब; प्रातिष्ठन्ते=बैठ जाती हैं; एवम्=ऐसी ही दशा (इन सबकी हुई); वाक् चक्षुः श्रोत्रम् च मनः=अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन; ते=वे (सभी); प्रीताः प्राणम् स्तुन्वन्ति=प्राणकी श्रेष्ठताका अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राणकी स्तुति करने लगे॥४॥
व्याख्या—तब उनको अपना प्रभाव दिखलाकर सावधान करनेके लिये वह सर्वश्रेष्ठ प्राण अभिमानमें ठेस लगनेसे मानो रूठकर इस शरीरसे बाहर निकलनेके लिये ऊपरकी ओर उठने लगा। फिर तो सब-के-सब देवता विवश होकर उसीके साथ बाहर निकलने लगे; कोई भी स्थिर नहीं रह सका। जब वह अपने स्थानपर स्थित हो गया, तब अन्य सब भी स्थित हो गये। जैसे मधुमक्खियोंका राजा जब अपने स्थानसे उड़ता है, तब उसके साथ ही वहाँ बैठी हुई अन्य सब मधुमक्खियाँ भी उड़ जाती हैं और जब वह बैठ जाता है तब अन्य सब भी बैठ जाती हैं, ऐसी ही दशा इन सब वागादि देवताओंकी भी
प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८९
हुई। यह देखकर वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि सब इन्द्रियोंको और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंको भी यह विश्वास हो गया कि हम सबमें प्राण ही श्रेष्ठ है; अतः वे सब प्रसन्नतापूर्वक निम्न प्रकारसे प्राणकी स्तुति करने लगे॥ ४॥
सम्बन्ध— प्राणको ही परब्रह्म परमेश्वरका स्वरूप मानकर उपासना करनेके लिये उसका सर्वात्मरूपसे महत्त्व बतलाया जाता है—*
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत्॥ ५॥
एषः अग्निः तपति=यह प्राण अग्निरूपसे तपता है; एषः सूर्यः=यही सूर्य है; एषः पर्जन्यः=यही मेघ है; [एषः] मघवान्=यही इन्द्र है; एषः वायुः=यही वायु है (तथा); एषः देवः=यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी=पृथ्वी (एवं); रयिः=रयि है (तथा); यत्=जो कुछ; सत्=सत्; च=और; असत्=असत् है; च=तथा; [यत्]=जो; अमृतम्=अमृत कहा जाता है (वह भी प्राण ही है)॥ ५॥
**व्याख्या—**वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है॥ ५॥
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥ ६॥
रथनाभौ=रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव=अरोंकी भाँति; ऋचः=ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ; यजूंषि=यजुर्वेदके मन्त्र (तथा); सामानि=सामवेदके मन्त्र; यज्ञः च=यज्ञ और; ब्रह्म क्षत्रम्=(यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम्=ये सब-के-सब; प्राणे=(इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हैं॥ ६॥
* इस विषयका वर्णन अथर्ववेद काण्ड ११ सू० ४ में विस्तारपूर्वक आया है।
| १९० | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न २ |
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व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का-सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के-सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है॥ ६॥
सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि॥ ७॥
**प्राण=**हे प्राण!; **त्वम् एव=**तू ही; **प्रजापतिः=**प्रजापति है; [त्वम् एव]=तू ही; **गर्भे चरसि=**गर्भमें विचरता है; प्रतिजायसे=(और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है; **तु=**निश्चय ही; **इमाः=**ये सब; **प्रजाः=**प्राणी; **तुभ्यम्=**तुझे; **बलिम् हरन्ति=**भेंट समर्पण करते हैं; **यः=**जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि=(अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है॥ ७॥
व्याख्या— हे प्राण! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है। ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं। भाव यह कि तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीरमें स्थित हो रहा है॥ ७॥
देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि॥ ८॥
(हे प्राण!) देवानाम्=(तू) देवताओंके लिये; **वह्नितमः=**उत्तम अग्नि; **असि=**है; **पितॄणाम्=**पितरोंके लिये; **प्रथमा स्वधा=**पहली स्वधा है; **अथर्वाङ्गिरसाम्=**अथर्वाङ्गिरस आदि; **ऋषीणाम्=**ऋषियोंके द्वारा; चरितम्= आचरित; **सत्यम्=**सत्य; **असि=**है॥ ८॥
व्याख्या— हे प्राण! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम
प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १११
अग्नि है। पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है॥ ८॥
इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः॥ ९॥
प्राण=हे प्राण!; त्वम् तेजसा=तू तेजसे (सम्पन्न); इन्द्रः=इन्द्र; रुद्रः=रुद्र (और); परिरक्षिता=रक्षा करनेवाला; असि=है; त्वम्=तू ही; अन्तरिक्षे=अन्तरिक्षमें; चरसि=विचरता है (और); त्वम्=तू ही; ज्योतिषां पतिः=समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः=सूर्य है॥ ९॥
**व्याख्या—**हे प्राण! तू सब प्रकारके तेज (शक्तियों)-से सम्पन्न तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र है। तू ही प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है॥ ९॥
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति॥ १०॥
प्राण=हे प्राण!; यदा त्वम्=जब तू; अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय; ते इमाः प्रजाः=तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा; कामाय=यथेष्ट; अन्नम्=अन्न; भविष्यति=उत्पन्न होगा; इति=यह समझकर; आनन्दरूपाः=आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है॥ १०॥
**व्याख्या—**हे प्राण! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमें सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवन-निर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमें मग्न हो जाती है॥ १०॥
व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः॥ ११॥
प्राण=हे प्राण!; त्वम्=तू; व्रात्यः=संस्काररहित (होते हुए भी); एकर्षिः=एकमात्र
१९२ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २
सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तथा); वयम्=हमलोग (तेरे लिये); आद्यस्य=भोजनको; दातारः=देनेवाले हैं (और तू); अत्ता=भोक्ता (खानेवाला) है; विश्वस्य=समस्त जगत्का; सत्पतिः=(तू ही) श्रेष्ठ स्वामी है; मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले प्राण!; त्वम्=तू; नः=हमारा; पिता=पिता है॥ ११॥
**व्याख्या—**हे प्राण! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है; प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग (सब इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है। हे आकाशचारी समष्टिवायुरूप प्राण! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है॥ ११॥
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि। या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२॥
(हे प्राण!) या ते तनूः=जो तेरा स्वरूप; वाचि=वाणीमें; प्रतिष्ठिता=स्थित है; च=तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें; या चक्षुषि=जो चक्षुमें; च=और; या मनसि=जो मनमें; सन्तता=व्यास है; ताम्=उसको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; मा उत्क्रमीः=(तू) उत्क्रमण न कर॥ १२॥
**व्याख्या—**हे प्राण! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें व्यास है, उसे तू कल्याणमय बना ले। अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेश आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा। यह हमलोगोंकी प्रार्थना है॥ १२॥
प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३॥
इदम्=यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् (और); यत् त्रिदिवे=जो कुछ स्वर्गलोकमें; प्रतिष्ठितम्=स्थित है; सर्वम्=वह सब-का-सब; प्राणस्य=प्राणके;
प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १९३
वशे=अधीन है (हे प्राण!); माता पुत्रान् इव=जैसे माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार (तू हमारी); रक्षस्व=रक्षा कर; च=तथा; नः श्रीः च=हमें कान्ति और; प्रज्ञाम्=बुद्धि; विधेहि=प्रदान कर; इति=इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ॥ १३॥
**व्याख्या—**प्रत्यक्ष दीखनेवाले इस लोकमें जितने भी पदार्थ हैं और जो कुछ स्वर्गमें स्थित हैं, वे सब-के-सब इस प्राणके ही अधीन हैं। यह सोचकर वे इन्द्रियादि देवगण अन्तमें प्राणसे प्रार्थना करते हैं—'हे प्राण! जिस प्रकार माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा तू हमलोगोंको श्री—कान्ति अर्थात् कार्य करनेकी शक्ति और प्रज्ञा (ज्ञान) प्रदान कर।'
इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण—ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक-उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें भी आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रसङ्ग अधिक है॥ १३॥
॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त २॥
तृतीय प्रश्न
अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥
अथ ह एनम्=उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद)-से; कौसल्यः आश्वलायनः=कोसलदेशीय आश्वलायनने; च=भी; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्!; एषः प्राणः=यह प्राण; कुतः जायते=किससे उत्पन्न होता है; अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें; कथम् आयाति=कैसे आता है; वा आत्मानम्=तथा अपनेको; प्रविभज्य=विभाजित करके; कथम् प्रतिष्ठते=किस प्रकार स्थित होता है; केन उत्क्रमते=किस ढंगसे उत्क्रमण करता—शरीरसे बाहर निकलता है; कथम् बाह्यम्=किस प्रकार बाह्य जगत्को; अभिधत्ते=भलीभाँति धारण करता है (और); कथम् अध्यात्मम्=किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीरके भीतर रहनेवाले जगत्को; इति=यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें आश्वलायन मुनिने महर्षि पिप्पलादसे कुल छः बातें पूछी हैं—(१)जिस प्राणकी महिमाका आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है? (२) वह इस मनुष्य-शरीरमें कैसे प्रवेश करता है? (३) अपनेको विभाजित करके किस प्रकार शरीरमें स्थित रहता है? (४) एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाते समय पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है? (५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है? तथा (६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है? यहाँ प्राणके विषयमें वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तरमें नहीं आया है और जो पहले प्रश्नके उत्तरको सुनकर ही स्फुरित हुई हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तरके समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे॥ १॥
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९५
तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
तस्मै सः ह उवाच = उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि = तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु); ब्रह्मिष्ठः असि इति = वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है; तस्मात् = अतः; अहम् = मैं; ते = तेरे; ब्रवीमि = प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि 'तू जिस ढंगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु मैं जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है; अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ' ॥ २ ॥
आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥
एषः प्राणः = यह प्राण; आत्मनः = परमात्मासे; जायते = उत्पन्न होता है; यथा = जिस प्रकार; एषा छाया = यह छाया; पुरुषे = पुरुषके होनेपर (ही होती है); [ तथा ] = उसी प्रकार; एतत् = यह (प्राण); एतस्मिन् = इस (परमात्मा) के ही; आततम् = आश्रित है (और); अस्मिन् शरीरे = इस शरीरमें; मनोकृतेन = मनके किये हुए (संकल्प) से; आयाति = आता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। (मु० उ० २। ३) वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है; अतः इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन—उसीके आश्रित है—ठीक उसी प्रकार जैसे किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है। दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि मनद्वारा किये हुए संकल्पसे वह शरीरमें प्रवेश करता है। भाव
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ३ ]
यह है कि मरते समय प्राणीके मनमें उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अतः प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके संकल्पसे ही होता है॥ ३ ॥
सम्बन्ध— अब आश्लायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है—
यथा सप्तम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्नामानेता- न्नामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥
यथा=जिस प्रकार; सप्तम्राद एव=चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही; एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व=इन गाँवोंमें तुम रहो, इन गाँवोंमें तुम रहो; इति=इस प्रकार; अधिकृतान्=अधिकारियोंको; विनियुङ्क्ते=अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव=उसी प्रकार; एषः प्राणः=यह मुख्य प्राण; इतरान्=दूसरे; प्राणान्=प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव=पृथक्-पृथक् ही; संनिधत्ते=स्थापित करता है॥ ४ ॥
व्याख्या— यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं—‘जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती सप्तम्राद भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गस्वरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्-पृथक् स्थानोंमें पृथक्-पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है॥ ४ ॥
सम्बन्ध— अब मुख्य प्राण, अपान और समान—इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है—
प्रायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष होतद्भुतमत्रं समं नयति तस्मादेताः समाधिषो भवन्ति ॥ ५ ॥
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९७
प्राणः= (वह) प्राण; पायूपस्थे= गुदा और उपस्थमें; अपानम् [ नियुङ्क्ते ] = अपानको रखता है; स्वयम्= स्वयं; मुखनासिकाभ्याम्= मुख और नासिकाद्वारा (विचरता हुआ); चक्षुःश्रोत्रे= नेत्र और श्रोत्रमें; प्रातिष्ठते= स्थित रहता है; तु मध्ये= और शरीरके मध्यभागमें; समानः= समान (रहता) है; एषः हि= यह (समान वायु) ही; एतत् हुतम् अन्नम्= इस प्राणाग्निमें हवन किये हुए अन्नको; समम् नयति= समस्त शरीरमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है; तस्मात्= उससे; एताः सप्त= ये सात; अर्चिषः= ज्वालाएँ (विषयोंको प्रकाशित करनेवाले ऊपरके द्वार); भवन्ति= उत्पन्न होती हैं॥ ५॥
व्याख्या— यह स्वयं तो मुख और नासिकाद्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्रमें स्थित रहता है तथा गुदा और उपस्थमें अपानको स्थापित करता है। उसका काम मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है; रज, वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है। शरीरके मध्यभाग—नाभिमें समानको रखता है। यह समान वायुको ही प्राणरूप अग्निमें हवन किये हुए—उदरमें डाले हुए अन्नको अर्थात् उसके सारको सम्पूर्ण शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है। उस अन्नके सारभूत रससे ही इस शरीरमें ये सात ज्वालाएँ अर्थात् समस्त विषयोंको प्रकाशित करनेवाले दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख (रसना)—ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं; उस रससे पुष्ट होकर ही ये अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं॥ ५॥
सम्बन्ध— अब व्यानकी गतिका वर्णन किया जाता है—
हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां
द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु
व्यानश्चरति ॥ ६ ॥
एषः हि= यह प्रसिद्ध; आत्मा= जीवात्मा; हृदि= हृदयदेशमें रहता है; अत्र= इस (हृदय) में; एतत्= यह; नाडीनाम् एकशतम्= मूलरूपसे एक सौ नाडियोंका समुदाय है; तासाम्= उनमेंसे; एकैकस्याम्= एक-एक नाडीमें; शतम् शतम्= एक-
१९८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
एक सौ (शाखाएँ) हैं (प्रत्येक शाखा-नाडीकी); द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः = बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि = हजार प्रतिशाखानाडियाँ; भवन्ति = होती हैं; आसु = इनमें; व्यानः = व्यानवायु; चरति = विचरण करता है॥ ६॥
व्याख्या— इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे प्रत्येक नाडीकी एक-एक सौ शाखा-नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाडीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़ नाडियाँ हैं; इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है॥ ६॥
सम्बन्ध— अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं—
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७॥
अथ = तथा; एकया = जो एक नाडी और है, उसके द्वारा; उदानः ऊर्ध्वः = उदानवायु ऊपरकी ओर; [ चरति ] = विचरता है; [ सः ] पुण्येन = वह पुण्यकर्मोंके द्वारा; [ मनुष्यम् ] = मनुष्यको; पुण्यम् लोकम् = पुण्यलोकोंमें; नयति = ले जाता है; पापेन = पापकर्मोंके कारण (उसे); पापम् [ नयति ] = पापयोनियोंमें ले जाता है (तथा); उभाभ्याम् एव = पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा (जीवको); मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीरमें; [ नयति ] = ले जाता है॥ ७॥
व्याख्या— इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाडी और है जिसको ‘सुषुम्णा’ कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीरमें ऊपरकी ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं—) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९९
है। पापकर्मोंसे युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य—दोनों प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीरमें ले जाता है*॥७॥ **सम्बन्ध—**अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं—
**आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः।**
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः॥८॥
**ह=**यह निश्चय है कि; **आदित्यः वै=**सूर्य ही; **बाह्यः प्राणः=**बाह्य प्राण है; **एषः**
**हि=**यही; **एनम् चाक्षुषम्=**इस नेत्रसम्बन्धी; **प्राणम्=**प्राणपर; **अनुगृह्णानः=**अनुग्रह करता हुआ; **उदयति=**उदित होता है; **पृथिव्याम्=**पृथ्वीमें; **या देवता=**जो (अपानवायुकी शक्तिरूप) देवता है; **सा एषा=**वही यह; **पुरुषस्य=**मनुष्यके; **अपानम्=**अपान वायुको; **अवष्टभ्य=**स्थिर किये; [वर्तते]=रहता है; **अन्तरा=**पृथ्वी और स्वर्गके बीच; **यत् आकाशः=**जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है; **सः समानः=**वह समान है; **वायुः व्यानः=**वायु ही व्यान है॥८॥ **व्याख्या—**यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूपसे उदय होकर इस शरीरके बाह्य अङ्ग- प्रत्यङ्गोंको पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रियरूप आध्यात्मिक शरीरपर अनुग्रह
* एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है (गीता १५।८) यह बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये पूर्व मन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है एवं इसका स्पष्टीकरण १० वें मन्त्रमें किया गया है।
२०० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
करता है—उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वीमें जो देवता अर्थात् अपानवायुकी शक्ति है, वह मनुष्यके भीतर रहनेवाले अपानवायुको आश्रय देती है—टिकाये रखती है। यह इस अपानवायुकी शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियोंकी सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकारको धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचका जो आकाश है, वही समानवायुका बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंको अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीरके भीतर रहनेवाले समानवायुको विचरनेके लिये शरीरमें अवकाश देता है; इसीकी सहायतासे श्रोत्र-इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाशमें विचरनेवाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यानका बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गको चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है; भीतरी व्यानवायुको नाडियोंमें संचारित करने तथा त्वचा-इन्द्रियको स्पर्शका ज्ञान करानेमें भी यह सहायक है॥८॥
तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥
ह तेजः वै = प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही; उदानः = उदान है; तस्मात् = इसीलिये; उपशान्ततेजाः = जिसके शरीरका तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा); मनसि = मनमें; सम्पद्यमानैः = विलीन हुई; इन्द्रियैः = इन्द्रियोंके साथ; पुनर्भवम् = पुनर्जन्मको (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥
**व्याख्या—**सूर्य और अग्निका जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदानका बाह्य स्वरूप है। वह शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंको ठंडा नहीं होने देता और शरीरके भीतरकी ऊष्माको भी स्थिर रखता है। जिसके शरीरसे उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नहीं रहता; अतः शरीरकी गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहनेवाला जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके साथ-साथ दूसरे शरीरमें चला जाता है (गीता १५।८) ॥ ९॥
**सम्बन्ध—**अब आश्वलायनके चौथे प्रश्नमें आयी हुई एक शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरमें या लोकोंमें प्रवेश करनेकी बातका पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है—
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् २०१
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
एषः=यह (जीवात्मा); यच्चित्तः=जिस संकल्पवाला होता है; तेन=उस संकल्पके साथ; प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है; प्राणः=मुख्य प्राण; तेजसा युक्तः=तेज (उदान) से युक्त हो; आत्मना सह=अपने सहित (मन, इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको); यथासंकल्पितम्= उसके संकल्पानुसार; लोकम्=भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें; नयति=ले जाता है ॥ १० ॥
व्याख्या—मरते समय इस आत्माका जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमें जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८।६), उस संकल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायुसे मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उस अन्तिम संकल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अतः मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्का ही चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है, न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया तो सदाकी भाँति पुनः चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥
सम्बन्ध—अब प्राणविषयक ज्ञानका सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं—
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
यः विद्वान्=जो कोई विद्वान्; एवम् प्राणम्=इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को; वेद=जानता है; अस्य=उसकी; प्रजा=संतानपरम्परा; न ह हीयते=कदापि नष्ट नहीं होती; अमृतः=(वह) अमर; भवति=हो जाता है; तत् एषः=इस विषयका यह (अगला); श्लोकः=श्लोक (है) ॥ ११ ॥
२०२ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
**व्याख्या—**जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राणके रहस्यको समझ लेता है, प्राणके महत्त्वको समझकर हर प्रकारसे उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी संतानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्यको समझकर अपने जीवनको सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान्के चिन्तनसे शून्य नहीं रहने देता, तो सदाके लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है। इस विषयपर निम्नलिखित ऋचा है— ॥ ११॥
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा। अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृत- मश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥
**प्राणस्य=**प्राणकी; **उत्पत्तिम्=**उत्पत्ति; **आयतिम्=**आगम; **स्थानम्=**स्थान; **विभुत्वम् एव=**और व्यापकताको भी; **च=**तथा; [ बाह्यम् ] **एव अध्यात्मम् पञ्चधा च=**बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदोंको भी; **विज्ञाय=**भलीभाँति जानकर; अमृतम् अश्नुते=(मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है; **विज्ञाय अमृतम् अश्नुते इति=**जानकर अमृतका अनुभव करता है। यह पुनरुक्ति प्रश्नकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है॥१२॥
**व्याख्या—**उपर्युक्त विवेचनके अनुसार जो मनुष्य प्राणकी उत्पत्तिको अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है—इस रहस्यको जानता है, शरीरमें उसके प्रवेश करनेकी प्रक्रियाका तथा इसकी व्यापकताका ज्ञान रखता है तथा जो प्राणकी स्थितिको अर्थात् बाहर और भीतर—कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्यको तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदोंके रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमयके संयोग-सुखका निरन्तर अनुभव करता है॥ १२॥
॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ३ ॥
चतुर्थ प्रश्न
अथ हैनं सौर्वायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वप्नन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्यशयति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन् सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥
अथ=तदनन्तरः; ह एनम्=इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से; गार्ग्यः=गर्गगोत्रमें उत्पन्न; सौर्वायणी पप्रच्छ=सौर्वायणी ऋषिने पूछा; भगवन्=भगवन्!; एतस्मिन् पुरुषे=इस मनुष्य-शरीरमें; कानि स्वप्नन्ति=कौन-कौन सोते हैं; अस्मिन् कानि जाग्रति=इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; एषः कतरः देवः=यह कौन देवता; स्वप्नान् पश्यति=स्वप्नोंको देखता है; एतत् सुखम्=यह सुख; कस्य भवति=किसको होता है; सर्वे=(और) ये सब-के-सब; कस्मिन्=किसमें; नु=निश्चितरूपसे; सम्प्रतिष्ठिताः=सम्पूर्णतया स्थित; भवन्ति इति=रहते हैं, यह; (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥
व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलादसे पाँच बातें पूछी हैं—(१) गाढ़ निद्राके समय इस मनुष्य-शरीरमें रहनेवाले पूर्वोक्त देवताओंमेंसे कौन-कौन सोते हैं? (२) कौन-कौन जागते रहते हैं? (३) स्वप्न-अवस्थामें इनमेंसे कौन देवता स्वप्नकी घटनाओंको देखता रहता है? (४) निद्रा-अवस्थामें सुखका अनुभव किसको होता है? और (५) ये सब-के-सब देवता सर्वभावसे किसमें स्थित हैं? अर्थात् किसके आश्रित हैं? इस प्रकार इस प्रश्नमें गार्ग्य मुनिने जीवात्मा और परमात्माका पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया ॥ १ ॥
तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तंजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्मृशते नाभिवादते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥
२०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ४ ]
तस्मै सः ह उवाच=उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षिने कहा; गार्ग्य=हे गार्ग्य!; यथा=जिस प्रकार; अस्तम् गच्छतः अर्कस्य=अस्त होते हुए सूर्यकी; सर्वाः मरीचयः=सब-की-सब किरणें; एतस्मिन् तेजोमण्डले=इस तेजोमण्डलमें; एकीभवन्ति=एक हो जाती हैं (फिर); उदयतः ताः=उदय होनेपर वे (सब); पुनः पुनः=पुनः-पुनः; प्रचरन्ति=सब ओर फैली रहती हैं; ह एवम् वै=ठीक ऐसे ही (निद्राके समय); तत् सर्वम्=वे सब इन्द्रियाँ (भी); परे देवे मनसि=परम देव मनमें; एकीभवति=एक हो जाती हैं; तेन तर्हि एषः पुरुषः=इस कारण उस समय यह जीवात्मा; न शृणोति=न (तो) सुनता है; न पश्यति=न देखता है; न जिघ्रति=न सँघता है; न रसयते=न स्वाद लेता है; न स्पर्शते=न स्पर्श करता है; न अभिवदते=न बोलता है; न आदते=न ग्रहण करता है; न आनन्दयते=न मैथुनका सुख भोगता है; न विस्जते=न मल-मूत्रका त्याग करता है (और); न इयायते=न चलता ही है; स्वपिति इति आचक्षते=उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महात्मा पिप्पलाद ऋषिने गार्ग्यके पहले प्रश्नका इस प्रकार उत्तर दिया है—'गार्ग्य! जब सूर्य अस्त होता है, उस समय उसकी सब ओर फैली हुई सम्पूर्ण किरणें जिस प्रकार उस तेजःपुञ्जमें मिलकर एक हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार गाढ़ निद्राके समय तुम्हारे पृष्ठे हुए सब देवता अर्थात् सब-की-सब इन्द्रियाँ उन सबसे श्रेष्ठ जो मनरूप देव है, उसमें विलीन होकर तद्रूप हो जाती हैं। इसलिये उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न चलता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न मैथुनका सुख ही भोगता है। भाव यह है कि उस समय दसों इन्द्रियोंका कार्य सर्वथा बंद रहता है। केवल लोग कहते हैं कि इस समय यह पुरुष सो रहा है।* उसके
- यहाँ सुषुप्तिकालमें मनका व्यापार चालू रहता है या नहीं, इस विषयमें कुछ नहीं कहा। सब इन्द्रियोंका मनमें विलीन हो जाना तो बताया गया; किंतु मन भी किसीमें विलीन हो जाता है—यह बात नहीं कही गयी। महर्षि पतञ्जलि भी निद्राको चित्तको एक वृत्ति मानते हैं (पा० यो० १।१०)। इससे तो यह जान पड़ता है कि मन विलीन नहीं होता। परंतु अगले मन्त्रमें पञ्चवृत्यात्मक प्राणको ही जागनेवाला बतलाया गया है, मनको नहीं; अतः मनका लय होता
प्रश्न ४ ]
प्रश्नोपनिषद्
२०५
जागनेपर पुनः वे सब इन्द्रियाँ मनसे पृथक् होकर अपना-अपना कार्य करने लगती हैं—टीक वैसे ही जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेपर उसकी किरणें पुनः सब ओर फैल जाती हैं ॥ २ ॥
सम्बन्ध— अब गार्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है—
प्राणाग्रय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
एतस्मिन् पुरे =इस शरीररूप नगरमें; प्राणाग्रयः एव =पाँच प्राणरूप अग्नियों ही; जाग्रति =जागती रहती हैं; ह एषः अपानः वै =यह प्रसिद्ध अपान ही; गार्हपत्यः =गार्हपत्य अग्नि है; व्यानः =व्यान; अन्वाहार्यपचनः =अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि ) है; गार्हपत्यात् यत् प्रणीयते =गार्हपत्य अग्निसे जो उठाकर ले जायी जाती है (वह); आहवनीयः =आहवनीय अग्नि ; प्रणयनात् =प्रणयन (उठाकर ले जाये जाने) के कारण ही; प्राणः =प्राणरूप है ॥ ३ ॥
व्याख्या— उस समय इस मनुष्य-शरीररूप नगरमें पाँच प्राणरूप अग्नियों ही जागती रहती हैं। यह गार्यद्वारा पूछे हुए दूसरे प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर है। यहाँ निद्राको यज्ञका रूप देनेके लिये पाँचों प्राणोंको अग्निरूप बतलाया है। यज्ञमें अग्निकी प्रधानता होती है, इसलिये यहाँ संक्षेपतः प्राणमात्रको अग्निके नामसे कह दिया। परंतु आगे इस यज्ञके रूपकमें किस प्राणवृत्तिकी किसके स्थानमें कल्पना करनी चाहिये, इसका स्पष्टीकरण करते हैं। कहना यह है कि शरीरमें जो प्राणकी अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञकी 'गार्हपत्य' अग्नि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपानसे प्राण उठते हैं, इस
है या नहीं— यह बात स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि पुनः चतुर्थ मन्त्रमें मनको यजमान बताकर उसके ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही गयी है। इससे यह कहा जा सकता है कि मनका भी लय हो जाता है।