ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ४ ]
तस्मै सः ह उवाच=उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षिने कहा; गार्ग्य=हे गार्ग्य!; यथा=जिस प्रकार; अस्तम् गच्छतः अर्कस्य=अस्त होते हुए सूर्यकी; सर्वाः मरीचयः=सब-की-सब किरणें; एतस्मिन् तेजोमण्डले=इस तेजोमण्डलमें; एकीभवन्ति=एक हो जाती हैं (फिर); उदयतः ताः=उदय होनेपर वे (सब); पुनः पुनः=पुनः-पुनः; प्रचरन्ति=सब ओर फैली रहती हैं; ह एवम् वै=ठीक ऐसे ही (निद्राके समय); तत् सर्वम्=वे सब इन्द्रियाँ (भी); परे देवे मनसि=परम देव मनमें; एकीभवति=एक हो जाती हैं; तेन तर्हि एषः पुरुषः=इस कारण उस समय यह जीवात्मा; न शृणोति=न (तो) सुनता है; न पश्यति=न देखता है; न जिघ्रति=न सँघता है; न रसयते=न स्वाद लेता है; न स्पर्शते=न स्पर्श करता है; न अभिवदते=न बोलता है; न आदते=न ग्रहण करता है; न आनन्दयते=न मैथुनका सुख भोगता है; न विस्जते=न मल-मूत्रका त्याग करता है (और); न इयायते=न चलता ही है; स्वपिति इति आचक्षते=उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महात्मा पिप्पलाद ऋषिने गार्ग्यके पहले प्रश्नका इस प्रकार उत्तर दिया है—'गार्ग्य! जब सूर्य अस्त होता है, उस समय उसकी सब ओर फैली हुई सम्पूर्ण किरणें जिस प्रकार उस तेजःपुञ्जमें मिलकर एक हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार गाढ़ निद्राके समय तुम्हारे पृष्ठे हुए सब देवता अर्थात् सब-की-सब इन्द्रियाँ उन सबसे श्रेष्ठ जो मनरूप देव है, उसमें विलीन होकर तद्रूप हो जाती हैं। इसलिये उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न चलता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न मैथुनका सुख ही भोगता है। भाव यह है कि उस समय दसों इन्द्रियोंका कार्य सर्वथा बंद रहता है। केवल लोग कहते हैं कि इस समय यह पुरुष सो रहा है।* उसके
- यहाँ सुषुप्तिकालमें मनका व्यापार चालू रहता है या नहीं, इस विषयमें कुछ नहीं कहा। सब इन्द्रियोंका मनमें विलीन हो जाना तो बताया गया; किंतु मन भी किसीमें विलीन हो जाता है—यह बात नहीं कही गयी। महर्षि पतञ्जलि भी निद्राको चित्तको एक वृत्ति मानते हैं (पा० यो० १।१०)। इससे तो यह जान पड़ता है कि मन विलीन नहीं होता। परंतु अगले मन्त्रमें पञ्चवृत्यात्मक प्राणको ही जागनेवाला बतलाया गया है, मनको नहीं; अतः मनका लय होता