भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

चतुर्थ प्रश्न

अथ हैनं सौर्वायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वप्नन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्यशयति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन् सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥

अथ=तदनन्तरः; ह एनम्=इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से; गार्ग्यः=गर्गगोत्रमें उत्पन्न; सौर्वायणी पप्रच्छ=सौर्वायणी ऋषिने पूछा; भगवन्=भगवन्!; एतस्मिन् पुरुषे=इस मनुष्य-शरीरमें; कानि स्वप्नन्ति=कौन-कौन सोते हैं; अस्मिन् कानि जाग्रति=इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; एषः कतरः देवः=यह कौन देवता; स्वप्नान् पश्यति=स्वप्नोंको देखता है; एतत् सुखम्=यह सुख; कस्य भवति=किसको होता है; सर्वे=(और) ये सब-के-सब; कस्मिन्=किसमें; नु=निश्चितरूपसे; सम्प्रतिष्ठिताः=सम्पूर्णतया स्थित; भवन्ति इति=रहते हैं, यह; (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलादसे पाँच बातें पूछी हैं—(१) गाढ़ निद्राके समय इस मनुष्य-शरीरमें रहनेवाले पूर्वोक्त देवताओंमेंसे कौन-कौन सोते हैं? (२) कौन-कौन जागते रहते हैं? (३) स्वप्न-अवस्थामें इनमेंसे कौन देवता स्वप्नकी घटनाओंको देखता रहता है? (४) निद्रा-अवस्थामें सुखका अनुभव किसको होता है? और (५) ये सब-के-सब देवता सर्वभावसे किसमें स्थित हैं? अर्थात् किसके आश्रित हैं? इस प्रकार इस प्रश्नमें गार्ग्य मुनिने जीवात्मा और परमात्माका पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया ॥ १ ॥

तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तंजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्मृशते नाभिवादते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥