ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 548 में से
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प्रश्नोपनिषद्
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जागनेपर पुनः वे सब इन्द्रियाँ मनसे पृथक् होकर अपना-अपना कार्य करने लगती हैं—टीक वैसे ही जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेपर उसकी किरणें पुनः सब ओर फैल जाती हैं ॥ २ ॥
सम्बन्ध— अब गार्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है—
प्राणाग्रय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
एतस्मिन् पुरे =इस शरीररूप नगरमें; प्राणाग्रयः एव =पाँच प्राणरूप अग्नियों ही; जाग्रति =जागती रहती हैं; ह एषः अपानः वै =यह प्रसिद्ध अपान ही; गार्हपत्यः =गार्हपत्य अग्नि है; व्यानः =व्यान; अन्वाहार्यपचनः =अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि ) है; गार्हपत्यात् यत् प्रणीयते =गार्हपत्य अग्निसे जो उठाकर ले जायी जाती है (वह); आहवनीयः =आहवनीय अग्नि ; प्रणयनात् =प्रणयन (उठाकर ले जाये जाने) के कारण ही; प्राणः =प्राणरूप है ॥ ३ ॥
व्याख्या— उस समय इस मनुष्य-शरीररूप नगरमें पाँच प्राणरूप अग्नियों ही जागती रहती हैं। यह गार्यद्वारा पूछे हुए दूसरे प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर है। यहाँ निद्राको यज्ञका रूप देनेके लिये पाँचों प्राणोंको अग्निरूप बतलाया है। यज्ञमें अग्निकी प्रधानता होती है, इसलिये यहाँ संक्षेपतः प्राणमात्रको अग्निके नामसे कह दिया। परंतु आगे इस यज्ञके रूपकमें किस प्राणवृत्तिकी किसके स्थानमें कल्पना करनी चाहिये, इसका स्पष्टीकरण करते हैं। कहना यह है कि शरीरमें जो प्राणकी अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञकी 'गार्हपत्य' अग्नि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपानसे प्राण उठते हैं, इस
है या नहीं— यह बात स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि पुनः चतुर्थ मन्त्रमें मनको यजमान बताकर उसके ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही गयी है। इससे यह कहा जा सकता है कि मनका भी लय हो जाता है।