ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञकी कल्पनामें आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञमें आहवनीय अग्नि गार्हपत्यसे उठाकर लायी जाती है। पहले तीसरे प्रश्नके प्रसङ्गमें भी प्राणको ‘अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है’ इस व्युत्पत्तिद्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है (३।५)॥३॥
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमानः। इष्टफलमेवोदानः। स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति॥४॥
यत् उच्छ्वासनिःश्वासौ=जो ऊर्ध्वश्वास और अधोश्वास हैं; एतौ=ये दोनों (मानो); आहुती=(अग्निहोत्रकी) दो आहुतियाँ हैं; [एतौ यः]=इनको जो; समम्=समभावसे (सब ओर); नयति इति सः समानः=पहुँचाता है इसलिये जो ‘समान’ कहलाता है, वही; [होता]=हवन करनेवाला ऋत्विक् है; ह मनः वाव=यह प्रसिद्ध मन ही; यजमानः=यजमान है; इष्टफलम् एव=अभीष्ट फल ही; उदानः=उदान है; सः एनम्=वह (उदान) ही इस; यजमानम् अहः अहः=मनरूप यजमानको प्रतिदिन (निद्राके समय); ब्रह्म गमयति=ब्रह्मलोकमें भेजता है अर्थात् हृदयगुहामें ले जाता है॥४॥
व्याख्या— यह जो मुख्य प्राणका श्वास-प्रश्वासके रूपमें शरीरके बाहर निकलना और भीतर लौट जाना है, वही मानो इस यज्ञमें आहुतियाँ पड़ती हैं। इन आहुतियोंद्वारा जो शरीरके पोषक-तत्त्व शरीरमें प्रवेश कराये जाते हैं, वे ही हवि हैं। उस हविको समस्त शरीरमें आवश्यकतानुसार समभावसे पहुँचानेका कार्य समान वायुका है; इसलिये उसे समान कहते हैं। वही इस रूपकमें मानो ‘होता’ अर्थात् हवन करनेवाला ऋत्विक् है। अग्निरूप होनेपर भी आहुतियोंको पहुँचानेका कार्य करनेके कारण इसे ‘होता’ कहा गया है। पहले बताया हुआ मन ही मानो यजमान है और उदानवायु ही मानो उस यजमानका अभीष्ट फल है; क्योंकि जिस प्रकार अग्निहोत्र करनेवाले यजमानको उसका अभीष्ट फल उसे अपनी ओर आकर्षित करके कर्मफल भुगतानेके