भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २०७

लिये कर्मानुसार स्वर्गादि लोकोंमें ले जाता है, उसी प्रकार यह उदानवायु मनको प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोकमें परमात्माके निवासस्थानरूप हृदयगुहामें ले जाता है। वहाँ इस मनके द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुखका अनुभव करता है; क्योंकि जीवात्माका निवासस्थान भी वही है, यह बात छठे मन्त्रमें कही है। यहाँ 'ब्रह्म गमयति' से यह बात नहीं समझनी चाहिये कि निद्राजनित सुख ब्रह्मप्राप्तिके सुखकी किसी भी अंशमें समानता कर सकता है; क्योंकि यह तो तामस सुख है और परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका सुख तीनों गुणोंसे अतीत है॥४॥

सम्बन्ध— अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं—

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति॥ ५॥

अत्र स्वप्ने= इस स्वप्न-अवस्थामें; एषः देवः= यह देव (जीवात्मा); महिमानम्= अपनी विभूतिका; अनुभवति= अनुभव करता है; यत् दृष्टम् दृष्टम्= जो बार-बार देखा हुआ है; अनुपश्यति= उसीको बार-बार देखता है; श्रुतम् श्रुतम् एव अर्थम् अनुशृणोति= बार-बार सुनी हुई बातोंको ही पुनः-पुनः सुनता है; देशदिगन्तरैः च= नाना देश और दिशाओंमें; प्रत्यनुभूतम्= बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको; पुनः पुनः= पुनः-पुनः; प्रत्यनुभवति= अनुभव करता है (इतना ही नहीं); दृष्टम् च अदृष्टम् च= देखे हुए और न देखे हुएको भी; श्रुतम् च अश्रुतम् च= सुने हुए और न सुने हुएको भी; अनुभूतम् च= अनुभव किये हुए और; अननुभूतम् च= अनुभव न किये हुएको भी; सत् च असत् च= विद्यमान और अविद्यमानको भी; (इस प्रकार) सर्वम् पश्यति= सारी घटनाओंको देखता है; (तथा) सर्वः [सन्]= स्वयं सब कुछ बनकर; पश्यति= देखता है॥ ५॥

व्याख्या— गार्ग्य मुनिने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता