भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

२०८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४

स्वप्नोंको देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद इस प्रकार देते हैं, इस स्वप्न-अवस्थामें जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियोंद्वारा अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ-कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया हुआ है, उसीको यह स्वप्नमें बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परंतु यह नियम नहीं है कि जाग्रत्-अवस्थामें इसने जिस प्रकार, जिस ढंगसे और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्नमें भी अनुभव करता है। अपितु स्वप्नमें जाग्रत्की किसी घटनाका कोई अंश किसी दूसरी घटनाके किसी अंशके साथ मिलकर एक नये ही रूपमें इसके अनुभवमें आता है; अतः कहा जाता है कि स्वप्नकालमें यह देखे और न देखे हुएको भी देखता है, सुने और न सुने हुएको भी सुनता है, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी अनुभव करता है। जो वस्तु वास्तवमें है, उसे और जो नहीं है, उसे भी स्वप्नमें देख लेता है। इस प्रकार स्वप्नमें यह विचित्र ढंगसे सब घटनाओंका बार-बार अनुभव करता रहता है और स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है। उस समय जीवात्माके अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती॥ ५॥

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति॥ ६॥

सः यदा = वह (मन) जब; तेजसा अभिभूतः = तेज (उदानवायु) से अभिभूत; भवति = हो जाता है;* अत्र एषः देवः = इस स्थितिमें यह जीवात्मारूप देवता; स्वप्नान् = स्वप्नोंको; न पश्यति = नहीं देखता; अथ = तथा; तदा = उस समय; एतस्मिन् शरीरे = इस मनुष्य-शरीरमें (जीवात्माको); एतत् = इस; सुखम् = सुषुप्तिके सुखका अनुभव; भवति = होता है॥ ६॥


* पहले तीसरे प्रश्नोत्तर (३।९-१०) में बतला आये हैं कि उदानवायुका नाम तेज है। इस प्रकरणमें भी कहा गया है कि उदानवायु ही मनको ब्रह्मलोकमें अर्थात् हृदयमें ले जाता है, अतः यहाँ तेजसे अभिभूत होनेका अर्थ मनका उदानवायुसे आक्रान्त हो जाना है—यह बात समझनी चाहिये।