भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २०९

**व्याख्या—**गार्ग्य मुनिने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रामें सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—जब निद्राके समय यह मन उदानवायुके अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदानवायु इस मनको जीवात्माके निवासस्थान हृदयमें पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्थामें यह जीवात्मा मनके द्वारा स्वप्नकी घटनाओंको नहीं देखता। उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्माको ही होता है। इस शरीरमें सुख-दुःखोंको भोगनेवाला प्रत्येक अवस्थामें प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है (गीता १३। २१)॥ ६॥

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७॥

सः=(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये); सोम्य=हे प्रिय; यथा=जिस प्रकार; वयांसि=बहुत-से पक्षी (सायंकालमें); वासोवृक्षम्=अपने निवासरूप वृक्षपर (आकर); सम्प्रतिष्ठन्ते=आरामसे ठहरते हैं (बसेरा लेते हैं); ह एवम् वै तत् सर्वम्=ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जानेवाले पृथिवी आदि तत्त्वोंसे लेकर प्राणतक) सब-के-सब; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७॥

**व्याख्या—**गार्ग्य मुनिने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण—सब-के-सब किसमें स्थित हैं—किसके आश्रित हैं।' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—प्यारे गार्ग्य! आकाशमें उड़नेवाले पक्षिगण जिस प्रकार सायंकालमें लौटकर अपने निवासभूत वृक्षपर आरामसे बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले पृथ्वीसे लेकर प्राणतक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तममें, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं॥ ७॥

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं