ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२०६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञकी कल्पनामें आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञमें आहवनीय अग्नि गार्हपत्यसे उठाकर लायी जाती है। पहले तीसरे प्रश्नके प्रसङ्गमें भी प्राणको ‘अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है’ इस व्युत्पत्तिद्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है (३।५)॥३॥
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमानः। इष्टफलमेवोदानः। स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति॥४॥
यत् उच्छ्वासनिःश्वासौ=जो ऊर्ध्वश्वास और अधोश्वास हैं; एतौ=ये दोनों (मानो); आहुती=(अग्निहोत्रकी) दो आहुतियाँ हैं; [एतौ यः]=इनको जो; समम्=समभावसे (सब ओर); नयति इति सः समानः=पहुँचाता है इसलिये जो ‘समान’ कहलाता है, वही; [होता]=हवन करनेवाला ऋत्विक् है; ह मनः वाव=यह प्रसिद्ध मन ही; यजमानः=यजमान है; इष्टफलम् एव=अभीष्ट फल ही; उदानः=उदान है; सः एनम्=वह (उदान) ही इस; यजमानम् अहः अहः=मनरूप यजमानको प्रतिदिन (निद्राके समय); ब्रह्म गमयति=ब्रह्मलोकमें भेजता है अर्थात् हृदयगुहामें ले जाता है॥४॥
व्याख्या— यह जो मुख्य प्राणका श्वास-प्रश्वासके रूपमें शरीरके बाहर निकलना और भीतर लौट जाना है, वही मानो इस यज्ञमें आहुतियाँ पड़ती हैं। इन आहुतियोंद्वारा जो शरीरके पोषक-तत्त्व शरीरमें प्रवेश कराये जाते हैं, वे ही हवि हैं। उस हविको समस्त शरीरमें आवश्यकतानुसार समभावसे पहुँचानेका कार्य समान वायुका है; इसलिये उसे समान कहते हैं। वही इस रूपकमें मानो ‘होता’ अर्थात् हवन करनेवाला ऋत्विक् है। अग्निरूप होनेपर भी आहुतियोंको पहुँचानेका कार्य करनेके कारण इसे ‘होता’ कहा गया है। पहले बताया हुआ मन ही मानो यजमान है और उदानवायु ही मानो उस यजमानका अभीष्ट फल है; क्योंकि जिस प्रकार अग्निहोत्र करनेवाले यजमानको उसका अभीष्ट फल उसे अपनी ओर आकर्षित करके कर्मफल भुगतानेके
प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २०७
लिये कर्मानुसार स्वर्गादि लोकोंमें ले जाता है, उसी प्रकार यह उदानवायु मनको प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोकमें परमात्माके निवासस्थानरूप हृदयगुहामें ले जाता है। वहाँ इस मनके द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुखका अनुभव करता है; क्योंकि जीवात्माका निवासस्थान भी वही है, यह बात छठे मन्त्रमें कही है। यहाँ 'ब्रह्म गमयति' से यह बात नहीं समझनी चाहिये कि निद्राजनित सुख ब्रह्मप्राप्तिके सुखकी किसी भी अंशमें समानता कर सकता है; क्योंकि यह तो तामस सुख है और परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका सुख तीनों गुणोंसे अतीत है॥४॥
सम्बन्ध— अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं—
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति॥ ५॥
अत्र स्वप्ने= इस स्वप्न-अवस्थामें; एषः देवः= यह देव (जीवात्मा); महिमानम्= अपनी विभूतिका; अनुभवति= अनुभव करता है; यत् दृष्टम् दृष्टम्= जो बार-बार देखा हुआ है; अनुपश्यति= उसीको बार-बार देखता है; श्रुतम् श्रुतम् एव अर्थम् अनुशृणोति= बार-बार सुनी हुई बातोंको ही पुनः-पुनः सुनता है; देशदिगन्तरैः च= नाना देश और दिशाओंमें; प्रत्यनुभूतम्= बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको; पुनः पुनः= पुनः-पुनः; प्रत्यनुभवति= अनुभव करता है (इतना ही नहीं); दृष्टम् च अदृष्टम् च= देखे हुए और न देखे हुएको भी; श्रुतम् च अश्रुतम् च= सुने हुए और न सुने हुएको भी; अनुभूतम् च= अनुभव किये हुए और; अननुभूतम् च= अनुभव न किये हुएको भी; सत् च असत् च= विद्यमान और अविद्यमानको भी; (इस प्रकार) सर्वम् पश्यति= सारी घटनाओंको देखता है; (तथा) सर्वः [सन्]= स्वयं सब कुछ बनकर; पश्यति= देखता है॥ ५॥
व्याख्या— गार्ग्य मुनिने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता
२०८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
स्वप्नोंको देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद इस प्रकार देते हैं, इस स्वप्न-अवस्थामें जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियोंद्वारा अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ-कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया हुआ है, उसीको यह स्वप्नमें बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परंतु यह नियम नहीं है कि जाग्रत्-अवस्थामें इसने जिस प्रकार, जिस ढंगसे और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्नमें भी अनुभव करता है। अपितु स्वप्नमें जाग्रत्की किसी घटनाका कोई अंश किसी दूसरी घटनाके किसी अंशके साथ मिलकर एक नये ही रूपमें इसके अनुभवमें आता है; अतः कहा जाता है कि स्वप्नकालमें यह देखे और न देखे हुएको भी देखता है, सुने और न सुने हुएको भी सुनता है, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी अनुभव करता है। जो वस्तु वास्तवमें है, उसे और जो नहीं है, उसे भी स्वप्नमें देख लेता है। इस प्रकार स्वप्नमें यह विचित्र ढंगसे सब घटनाओंका बार-बार अनुभव करता रहता है और स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है। उस समय जीवात्माके अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती॥ ५॥
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति॥ ६॥
सः यदा = वह (मन) जब; तेजसा अभिभूतः = तेज (उदानवायु) से अभिभूत; भवति = हो जाता है;* अत्र एषः देवः = इस स्थितिमें यह जीवात्मारूप देवता; स्वप्नान् = स्वप्नोंको; न पश्यति = नहीं देखता; अथ = तथा; तदा = उस समय; एतस्मिन् शरीरे = इस मनुष्य-शरीरमें (जीवात्माको); एतत् = इस; सुखम् = सुषुप्तिके सुखका अनुभव; भवति = होता है॥ ६॥
* पहले तीसरे प्रश्नोत्तर (३।९-१०) में बतला आये हैं कि उदानवायुका नाम तेज है। इस प्रकरणमें भी कहा गया है कि उदानवायु ही मनको ब्रह्मलोकमें अर्थात् हृदयमें ले जाता है, अतः यहाँ तेजसे अभिभूत होनेका अर्थ मनका उदानवायुसे आक्रान्त हो जाना है—यह बात समझनी चाहिये।
प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २०९
**व्याख्या—**गार्ग्य मुनिने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रामें सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—जब निद्राके समय यह मन उदानवायुके अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदानवायु इस मनको जीवात्माके निवासस्थान हृदयमें पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्थामें यह जीवात्मा मनके द्वारा स्वप्नकी घटनाओंको नहीं देखता। उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्माको ही होता है। इस शरीरमें सुख-दुःखोंको भोगनेवाला प्रत्येक अवस्थामें प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है (गीता १३। २१)॥ ६॥
स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७॥
सः=(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये); सोम्य=हे प्रिय; यथा=जिस प्रकार; वयांसि=बहुत-से पक्षी (सायंकालमें); वासोवृक्षम्=अपने निवासरूप वृक्षपर (आकर); सम्प्रतिष्ठन्ते=आरामसे ठहरते हैं (बसेरा लेते हैं); ह एवम् वै तत् सर्वम्=ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जानेवाले पृथिवी आदि तत्त्वोंसे लेकर प्राणतक) सब-के-सब; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७॥
**व्याख्या—**गार्ग्य मुनिने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण—सब-के-सब किसमें स्थित हैं—किसके आश्रित हैं।' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—प्यारे गार्ग्य! आकाशमें उड़नेवाले पक्षिगण जिस प्रकार सायंकालमें लौटकर अपने निवासभूत वृक्षपर आरामसे बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले पृथ्वीसे लेकर प्राणतक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तममें, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं॥ ७॥
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं
२१० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्श- यितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च॥ ८॥
पृथिवी च = पृथिवी और; पृथिवीमात्रा च = उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी; आपः च आपोमात्रा च = जल और रसतन्मात्रा भी; तेजः च तेजोमात्रा च = तेज और रूप-तन्मात्रा भी; वायुः च वायुमात्रा च = वायु और स्पर्श-तन्मात्रा भी; आकाशः च आकाशमात्रा च = आकाश और शब्द-तन्मात्रा भी; चक्षुः च द्रष्टव्यम् च = नेत्र-इन्द्रिय और देखनेमें आनेवाली वस्तु भी; श्रोत्रम् च श्रोतव्यम् च = श्रोत्र- इन्द्रिय और सुननेमें आनेवाली वस्तु भी; घ्राणम् च घ्रातव्यम् च = घ्राणेन्द्रिय और सूँघनेमें आनेवाली वस्तु भी; रसः च रसयितव्यम् च = रसना-इन्द्रिय और रसनाके विषय भी; त्वक् च स्पर्शयितव्यम् च = त्वक्-इन्द्रिय और स्पर्शमें आनेवाली वस्तु भी; वाक् च वक्तव्यम् च = वाक्-इन्द्रिय और बोलनेमें आनेवाला शब्द भी; हस्तौ च आदातव्यम् च = दोनों हाथ और पकड़नेमें आनेवाली वस्तु भी; उपस्थः च आनन्दयितव्यम् च = उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी; पायुः च विसर्जयितव्यम् च = गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी; पादौ च गन्तव्यम् च = दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी; मनः च मन्तव्यम् च = मन और मननमें आनेवाली वस्तु भी; बुद्धिः च बोद्धव्यम् च = बुद्धि और जाननेमें आनेवाली वस्तु भी; अहङ्कारः च अहङ्कर्तव्यम् च = अहंकार और उसका विषय भी; चित्तं च चेतयितव्यम् च = चित्त और चिन्तनमें आनेवाली वस्तु भी; तेजः च विद्योतयितव्यम् च = प्रभाव और उसका विषय भी; प्राणः च विधारयितव्यम् च = प्राण और प्राणके द्वारा धारण किये जानेवाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें यह बात कही गयी है कि स्थूल और सूक्ष्म
प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २११
पाँचों महाभूत, दसों इन्द्रियाँ और उनके विषय, चारों प्रकारके अन्तःकरण और उनके विषय तथा पाँच भेदोंवाला प्राणवायु—सब-के-सब परमात्माके ही आश्रित हैं। कहना यह है कि स्थूल पृथ्वी और उसका कारण गन्ध-तन्मात्रा, स्थूल जल-तत्त्व और उसका कारण रस-तन्मात्रा, स्थूल तेज-तत्त्व और उसका कारण रूप-तन्मात्रा, स्थूल वायु-तत्त्व और उसका कारण स्पर्श-तन्मात्रा, स्थूल आकाश और उसका कारण शब्द-तन्मात्रा—इस प्रकार अपने कारणोंसहित पाँचों भूत तथा नेत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा देखनेमें आनेवाली वस्तुएँ, श्रोत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा जो कुछ सुना जा सकता है वह सब, घ्राणेन्द्रिय और उसके द्वारा सूँघनेमें आनेवाले पदार्थ, रसना-इन्द्रिय और उसके द्वारा आस्वादनमें आनेवाले खट्टे-मीठे आदि सब प्रकारके रस, त्वचा-इन्द्रिय और उसके द्वारा स्पर्श करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, वाक्-इन्द्रिय और उसके द्वारा बोले जानेवाले शब्द, दोनों हाथ और उनके द्वारा पकड़नेमें आनेवाली सब वस्तुएँ, दोनों पैर और उनके गन्तव्य स्थान, उपस्थ-इन्द्रिय और मैथुनका सुख, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा त्यागा जानेवाला मल, मन और उसके द्वारा मनन करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, बुद्धि और उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले सब पदार्थ, अहंकार और उसका विषय, चित्त और चित्तके द्वारा चिन्तनमें आनेवाले पदार्थ, प्रभाव और प्रभावसे प्रभावित होनेवाली वस्तु एवं पाँच वृत्तिवाला प्राण और उसके द्वारा जीवन देकर धारण किये जानेवाले सब शरीर—ये सब-के-सब इसके कारणभूत परमेश्वरके ही आश्रित हैं॥ ८॥
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९॥
एषः=यह जो; द्रष्टा स्प्रष्टा=देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला; श्रोता घ्राता=सुननेवाला, सूँघनेवाला; रसयिता मन्ता=स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला; बोद्धा कर्ता=जाननेवाला तथा कर्म करनेवाला; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप; पुरुषः=पुरुष (जीवात्मा) है; सः हि=वह भी; अक्षरे=अविनाशी; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=भलीभाँति स्थित है॥ ९॥
| २१२ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
|---|
**व्याख्या—**देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके द्वारा समस्त कर्म करनेवाला जो यह विज्ञानस्वरूप पुरुष—जीवात्मा है, यह भी उन परम अविनाशी सबके आत्मा परब्रह्म पुरुषोत्तममें ही स्थिति पाता है। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर ही इसे वास्तविक शान्ति मिलती है; अतः इसके भी परम आश्रय वे परमेश्वर ही हैं॥ ९॥
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य। स सर्वज्ञः सर्वो भवति। तदेष श्लोकः॥ १०॥
ह यः वै=निश्चय ही जो कोई भी; तत् अच्छायम्=उस छायारहित; अशरीरम्=शरीररहित; अलोहितम्=लाल, पीले आदि रंगोंसे रहित; शुभ्रम् अक्षरम्=विशुद्ध अविनाशी पुरुषको; वेदयते=जानता है; सः=वह; परम् अक्षरम् एव=परम अविनाशी परमात्माको ही; प्रतिपद्यते=प्राप्त हो जाता है; सोम्य=हे प्रिय!; यः तु [एवम्]=जो कोई ऐसा है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ (और); सर्वः भवति=सर्वरूप हो जाता है; तत् एषः=उस विषयमें यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥
**व्याख्या—**यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि जो कोई भी मनुष्य उन छायारहित, शरीररहित, लाल-पीले आदि सब रंगोंसे रहित, विशुद्ध अविनाशी परमात्माको जान लेता है, वह परम अक्षर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हे सोम्य! जो कोई भी ऐसा है, अर्थात् जो भी उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है। इस विषयमें निम्नलिखित ऋचा है॥ १०॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः
प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र।
प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१३
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य
स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥
यत्र=जिसमें; प्राणाः=समस्त प्राण (और); भूतानि च=पाँचों भूत तथा; सर्वैः देवैः सह=सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तःकरणके सहित; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप आत्मा; सम्प्रतिष्ठन्ति=आश्रय लेते हैं; सोम्य=हे प्रिय!; तत् अक्षरम्=उस अविनाशी परमात्माको; यः तु वेदयते=जो कोई जान लेता है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ है; सर्वम् एव=(वह) सर्वस्वरूप परमेश्वरमें; आविवेश=प्रविष्ट हो जाता है; इति=इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समास हुआ) ॥ ११ ॥
व्याख्या—सबके परम कारण जिन परमेश्वरमें समस्त प्राण और पाँचों महाभूत तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके सहित स्वयं विज्ञानस्वरूप जीवात्मा—ये सब आश्रय लेते हैं, उन परम अक्षर अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है तथा सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह चतुर्थ प्रश्न समास हुआ ॥ ११ ॥
॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ४॥
पञ्चम प्रश्न
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥
अथ ह एनम्=उसके बाद इन ख्यातनामा महर्षि पिप्पलादसे; शैब्यः सत्यकामः=शिबिपुत्र सत्यकामने; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्; मनुष्येषु=मनुष्योंमेंसे; सः यः ह वै=वह जो कोई भी; प्रायणान्तम्=मृत्युपर्यन्त; तत् ओंकारम्=उस ओंकारका; अभिध्यायीत=सदा भलीभाँति ध्यान करता है; सः तेन=वह उस
२१४ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५
उपासनाके बलसे; कतमम् लोकम्=किस लोकको; वाव जयति=निस्संदेह जीत लेता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सत्यकामने ओंकारकी उपासनाके विषयमें प्रश्न किया है। उसने यही जिज्ञासा की है कि जो मनुष्य आजीवन सदा ओंकारकी भलीभाँति उपासना करता है, उसे उस उपासनाके द्वारा कौन-से लोककी प्राप्ति होती है, अर्थात् उसका क्या फल मिलता है॥ १॥
तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥ २॥
तस्मै सः ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; सत्यकाम=हे सत्यकाम; एतत् वै=निश्चय ही यह; यत् ओंकारः=जो ओंकार है; परम् ब्रह्म च अपरम् च=(वही) परब्रह्म और अपरब्रह्म भी है; तस्मात्=इसलिये; विद्वान्=इस प्रकारका ज्ञान रखनेवाला मनुष्य; एतेन एव=इस एक ही; ायतनेन=अवलम्बसे (अर्थात् प्रणवमात्रके चिन्तनसे); एकतरम्=अपर और परब्रह्ममेंसे किसी एकका; अन्वेति=(अपनी श्रद्धाके अनुसार) अनुसरण करता है॥ २॥
**व्याख्या—**इसके उत्तरमें महर्षि पिप्पलाद 'ओम्' इस अक्षरकी उसके लक्ष्यभूत परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ एकता करते हुए कहते हैं—सत्यकाम! यह जो 'ॐ' है, वह अपने लक्ष्यभूत परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। इसलिये यही परब्रह्म है और यही उन परब्रह्मसे प्रकट हुआ उनका विराट्स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है।* केवल इसी एक ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करके उसके द्वारा अपने इष्टको चाहनेवाला विज्ञानसम्पन्न मनुष्य उसे पा लेता है। भाव यह है कि जो मनुष्य परमेश्वरके विराट्स्वरूप—इस जगत्के ऐश्वर्यमय किसी भी अङ्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे ओंकारकी उपासना करता है, वह अपनी भावनाके अनुसार विराट्स्वरूप परमेश्वरके किसी एक अङ्गको प्राप्त
* कठोपनिषद् १। २। १६ में भी यही बात कही है, वहाँ 'अपरम्' विशेषण नहीं दिया है।
प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१५
करता है और जो इसके अन्तर्यामी आत्मा पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तमको लक्ष्य बनाकर उनको पानेके लिये निष्कामभावसे इसकी उपासना करता है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तमको पा लेता है। यही बात अगले मन्त्रोंमें भी स्पष्ट की गयी है॥ २॥
स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते। तमृचो मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति॥ ३॥
सः यदि = वह उपासक यदि; एकमात्रम् = एक मात्रासे युक्त ओंकारका; अभिध्यायीत = भलीभाँति ध्यान करे तो; सः तेन एव = वह उस उपासनासे ही; संवेदितः = अपने ध्येयकी ओर प्रेरित किया हुआ; तूर्णम् एव = शीघ्र ही; जगत्याम् = पृथ्वीमें; अभिसम्पद्यते = उत्पन्न हो जाता है; तम् ऋचः = उसको ऋग्वेदकी ऋचाएँ; मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीर; उपनयन्ते = प्राप्त करा देती हैं; तत्र सः = वहाँ वह उपासक; तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नः = तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर; महिमानम् = महिमाका; अनुभवति = अनुभव करता है॥ ३॥
व्याख्या— ओंकारका चिन्तन करनेवाला मनुष्य यदि विराट् परमेश्वरके भूः, भुवः और स्वः—इन तीनों रूपोंमेंसे भूलोकके ऐश्वर्यमें आसक्त होकर उसकी प्राप्तिके लिये ओंकारकी उपासना करता है तो वह मरनेके बाद अपने प्रापणीय ऐश्वर्यकी ओर प्रेरित होकर तत्काल पृथ्वीलोकमें आ जाता है। ॐकारकी पहली मात्रा ऋग्वेदस्वरूपा है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध है; अतः उसके चिन्तनसे साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ पुनः मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट करा देती हैं। वह उस नवीन मनुष्य-जन्ममें तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न उत्तम आचरणोंवाला श्रेष्ठ मनुष्य बनकर अतिशय ऐश्वर्यका उपभोग करता है, अर्थात् उसे नीची योनियोंमें नहीं भटकना पड़ता, वह मरनेके बाद मनुष्य होकर पुनः शुभ कर्म करनेमें समर्थ हो जाता है और वहाँ नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है॥ ३॥
२१६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥
अथ यदि=परंतु यदि; द्विमात्रेण=दो मात्राओंसे युक्त (ओंकारका); [ अभिध्यायीत ]=अच्छी प्रकार ध्यान करता है तो (उससे); मनसि=मनोमय चन्द्रलोकको; सम्पद्यते=प्राप्त होता है; सः यजुर्भिः=वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षमें स्थित; सोमलोकम्=चन्द्रलोकको; उन्नीयते=ऊपरकी ओर ले जाया जाता है; सः सोमलोके=वह चन्द्रलोकमें; विभूतिम्=वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभूय=अनुभव करके; पुनः आवर्तते=पुनः इस लोकमें लौट आता है॥ ४॥
व्याख्या— यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है; अर्थात् उस विराट्स्वरूप परमेश्वरके अङ्गभूत भूः (मनुष्यलोक) और भुवः (स्वर्गलोक)—इन दोनोंके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे—उसीको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है; उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमें ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमें पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्वकर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है॥ ४॥
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा। विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
पुनः यः=परंतु जो; त्रिमात्रेण=तीन मात्राओंवाले; ओम् इति=ओमरूप; एतेन अक्षरेण एव=इस अक्षरके द्वारा ही; एतम् परम् पुरुषम्=इस परम पुरुषका;
प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१७
अभिध्यायीत=निरन्तर ध्यान करता है; सः तेजसि=वह तेजोमय; सूर्ये सम्पन्नः=सूर्यलोकमें जाता है; (तथा) यथा पादोदरः=जिस प्रकार सर्प; त्वचा विनिर्मुच्यते=केंचुलीसे अलग हो जाता है; एवम् ह वै=ठीक उसी तरह; सः पाप्मना=वह पापोंसे; विनिर्मुक्तः=सर्वथा मुक्त हो जाता है; सः=(इसके बाद) वह; सामभिः=सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा; ब्रह्मलोकम् उन्नीयते=ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है; सः एतस्मात्=वह इस; जीवघनात्=जीवसमुदायरूप; परात् परम्=परमतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ; पुरिशयम्=शरीररूप नगरमें रहनेवाले अन्तर्यामी; पुरुषम्=परमपुरुष पुरुषोत्तमको; ईक्षते=साक्षात् कर लेता है; तत् एतौ=इस विषयमें ये (अगले); श्लोकौ भवतः=दो श्लोक हैं॥५॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें 'पुनः' शब्दके प्रयोगसे यह सूचित होता है कि उपर्युक्त कथनके अनुसार इस लोक और स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे अपर ब्रह्मको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवाले साधकोंसे विलक्षण साधकका यहाँ वर्णन किया गया है। उपासनाका सर्वोत्तम प्रकार यही है—यह भाव प्रकट करनेके लिये ही इस मन्त्रमें 'यदि' पदका प्रयोग भी नहीं किया गया है; क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है। इस मन्त्रमें यह भी स्पष्टरूपसे बतला दिया गया है कि ओंकार उस परब्रह्मका नाम है, इसके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना की जाती है। मन्त्रमें कहा गया है कि जो कोई साधक इन तीन मात्राओंवाले ओंकारस्वरूप अक्षरद्वारा परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना करता है, वह जैसे सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है—उसी प्रकार सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे छूटकर सर्वथा निर्विकार हो जाता है। उसे सामवेदके मन्त्र तेजोमय सूर्यमण्डलमेंसे ले जाकर सर्वोपरि ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं। वहाँ वह जीव समुदायरूप चेतनतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ उन परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है, जो सम्पूर्ण जगत्को अपनी शक्तिके किसी एक अंशमें धारण किये हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं तथा जो अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं। इसी विषयको स्पष्ट करनेवाले ये दो आगे कहे हुए श्लोक हैं॥५॥
२१८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः॥ ६॥
तिस्रः मात्राः=ओंकारकी तीनों मात्राएँ (‘अ’, ‘उ’ तथा ‘म’); अन्योन्यसक्ताः=एक दूसरीसे संयुक्त रहकर; प्रयुक्ताः=प्रयुक्त की गयी हों; अनविप्रयुक्ताः=या पृथक्-पृथक् एक-एक ध्येयके चिन्तनमें इनका प्रयोग किया गया हो (दोनों प्रकारसे ही वे); मृत्युमत्यः=मृत्युयुक्त हैं; बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु=बाहर, भीतर और बीचकी; क्रियासु=क्रियाओंमें; सम्यक्प्रयुक्तासु=पूर्णतया इन मात्राओंका प्रयोग किये जानेपर; ज्ञः न कम्पते=उस परमेश्वरको जाननेवाला ज्ञानी विचलित नहीं होता॥ ६॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें यह भाव दिखाया गया है कि ओंकारवाच्य परब्रह्म परमेश्वरका जो यह जगत्-रूप विराट्-स्वरूप है अर्थात् जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, यह उसका वास्तविक परम अविनाशी स्वरूप नहीं है, यह परिवर्तनशील है; अतः इसमें रहनेवाला जीव अमर नहीं होता। वह चाहे ऊँची-से-ऊँची योनिको प्राप्त कर ले, परंतु जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छूटता। इसके एक अङ्ग पृथ्वीलोककी या पृथ्वी और अन्तरिक्ष इन दोनों लोकोंकी अथवा तीनों लोकोंको मिलाकर सम्पूर्ण जगत्की अभिलाषा रखते हुए जो उपासना करता है, जिसका इस जगत्के आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी ओर लक्ष्य नहीं है, वरं जो जगत्के बाह्य स्वरूपमें ही आसक्त हो रहा है, वह उन्हें नहीं पाता, अतः बार-बार जन्मता-मरता रहता है। उन्हें तो वही साधक पा सकता है, जो अपने शरीरके बाहर, भीतर और शरीरके मध्यस्थान—हृदयदेशमें होनेवाली बाहरी, भीतरी और बीचकी समस्त क्रियाओंमें सर्वत्र ओंकारके वाच्यार्थरूप एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तमको व्याप्त समझता है और ओंकारके द्वारा उनकी उपासना करता है—उन्हें पानेकी ही अभिलाषासे ओंकारका जप, स्मरण
प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१९
और चिन्तन करता है, वह ज्ञानी परमात्माको पाकर फिर कभी अपनी स्थितिसे विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥
ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं
सामभिर्यत् तत्कवयो वेदयन्ते।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्
यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७॥
ऋग्भिः=(एक मात्राकी उपासनासे उपासक) ऋचाओंद्वारा; एतम्=इस मनुष्यलोकमें (पहुँचाया जाता है); यजुर्भिः=(दूसरा दो मात्राओंकी उपासना करनेवाला) यजुः श्रुतियोंद्वारा; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षमें (चन्द्रलोकतक पहुँचाया जाता है); सामभिः=(पूर्णरूपसे ओंकारकी उपासना करनेवाला) सामश्रुतियोंद्वारा; तत्=उस ब्रह्मलोकमें (पहुँचाया जाता है); यत्=जिसको; कवयः=ज्ञानीजन; वेदयन्ते=जानते हैं; विद्वान्=विवेकशील साधक; ओङ्कारेण एव=केवल ओंकाररूप; आयतनेन=अवलम्बनके द्वारा ही; तम्=उस परब्रह्म पुरुषोत्तमको; अन्वेति=पा लेता है; यत्=जो; तत्=वह; शान्तम्=परम शान्त; अजरम्=जरारहित; अमृतम्=मृत्युरहित; अभयम्=भयरहित; च=और; परम् इति=सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें तीसरे, चौथे और पाँचवें मन्त्रोंके भावका संक्षेपमें वर्णन करके ब्राह्मण-ग्रन्थके वाक्योंमें कही हुई बातका समर्थन किया गया है। भाव यह है कि एक मात्रा अर्थात् एक अङ्गको लक्ष्य बनाकर उपासना करनेवाले साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ मनुष्यलोकमें पहुँचा देती हैं। दो मात्राकी उपासना करनेवालेको अर्थात् जगत्के ऊँचे-से-ऊँचे—स्वर्गीय ऐश्वर्यको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवालेको यजुर्वेदके मन्त्र चन्द्रलोकमें ले जाते हैं और जो इन सबमें परिपूर्ण इनके आत्मस्वरूप परमेश्वरकी ओंकारके द्वारा उपासना करता है, उसको सामवेदके मन्त्र उस ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं, जिसे ज्ञानीजन जानते हैं। सम्पूर्ण रहस्यको समझनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य बाह्य जगत्में आसक्त न होकर ओंकारकी उपासनाद्वारा समस्त जगत्के आत्मरूप उन परब्रह्म
२२० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ६
परमात्माको पा लेते हैं, जो परम शान्त—सब प्रकारके विकारोंसे रहित हैं, जहाँ न बुढ़ापा है, न मृत्यु है, न भय है, जो अजर, अमर, निर्भय एवं सर्वश्रेष्ठ परम पुरुषोत्तम हैं॥ ७॥
॥ पञ्चम प्रश्न समाप्त ॥ ५ ॥
षष्ठ प्रश्न
अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ—भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत। षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ। तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम्। स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति॥ १॥
अथ=फिर; ह एनम्=इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से; भारद्वाजः= भरद्वाजपुत्र; सुकेशा=सुकेशाने; पप्रच्छ=पूछा—; भगवन्=भगवन्!; कौसल्यः= कोसलदेशीय; राजपुत्रः=राजकुमार; हिरण्यनाभः=हिरण्यनाभने; माम् उपेत्य=मेरे पास आकर; एतम् प्रश्नम्=यह प्रश्न; अपृच्छत=पूछा; भारद्वाज=हे भारद्वाज! (क्या तुम); षोडशकलम्=सोलह कलाओंवाले; पुरुषम्=पुरुषको; वेत्थ=जानते हो; तम् कुमारम्=(तब) उस राजकुमारसे; अहम्=मैंने; अब्रुवम्=कहा; अहम्=मैं; इमम्=इसे; न वेद=नहीं जानता; यदि=यदि; अहम्=मैं; इमम् अवेदिषम्=इसे जानता होता (तो); ते=तुझे; कथम् न अवक्ष्यम् इति=क्यों नहीं बताता; एषः वै=वह मनुष्य अवश्य; समूलः=मूलके सहित; परिशुष्यति=सर्वथा सूख जाता है (नष्ट हो जाता है); यः=जो; अनृतम्=झूठ; अभिवदति=बोलता है; तस्मात्=इसलिये (मैं); अनृतम्= झूठ; वक्तुम्=बोलनेमें; न अर्हामि=समर्थ नहीं हूँ; सः=वह राजकुमार (मेरा उत्तर सुनकर); तूष्णीम्=चुपचाप; रथम्=रथपर; आरुह्य=सवार होकर; प्रवव्राज=चला
प्रश्न ६ ] प्रश्नोपनिषद् २२१
गया; तम्=उसी बातको; त्वा पृच्छामि=मैं आपसे पूछ रहा हूँ; असौ=वह (सोलह कलाओंवाला); पुरुषः=पुरुष; क्व इति=कहाँ है? ॥ १॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सुकेशा ऋषिने अपनी अल्पज्ञता और सत्य-भाषणका महत्त्व प्रकट करते हुए सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमें प्रश्न किया है। वे बोले—'‘भगवन्! एक बार कोसलदेशका राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया था। उसने मुझसे पूछा—'भारद्वाज! क्या तुम सोलह कलाओंवाले पुरुषके विषयमें जानते हो?' मैंने उससे स्पष्ट कह दिया—'भाई! मैं उसे नहीं जानता; जानता होता तो तुम्हें अवश्य बता देता। न बतानेका कोई कारण नहीं है। तुम अपने मनमें यह न समझना कि मैंने बहाना करके तुम्हारे प्रश्नको टाल दिया है; क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता। झूठ बोलनेवालेका मूलोच्छेद हो जाता है, वह इस लोकमें या परलोकमें—कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं पा सकता' मेरी इस बातको सुनकर राजकुमार चुपचाप रथपर सवार होकर जैसे आया था, वैसे ही लौट गया। अब मैं आपके द्वारा उसी सोलह कलाओंवाले पुरुषका तत्त्व जानना चाहता हूँ; कृपया आप मुझे बतलायें कि वह कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है'’॥ १॥
तस्मै स होवाच। इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥ २॥
तस्मै=उससे; सः ह=वे सुप्रसिद्ध महर्षि; उवाच=बोले; सोम्य=हे प्रिय!; इह=यहाँ; अन्तःशरीरे=इस शरीरके भीतर; एव=ही; सः=वह; पुरुषः=पुरुष है; यस्मिन्=जिसमें; एताः=ये; षोडश=सोलह; कलाः=कलाएँ; प्रभवन्ति इति=प्रकट होती हैं॥ २॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें उस सोलह कलाओंवाले पुरुषका संकेतमात्र किया गया है। महर्षि पिप्पलाद कहते हैं—'प्रिय सुकेशा! जिन परमेश्वरसे सोलह कलाओंका समुदाय सम्पूर्ण जगद्रूप उनका विराट् शरीर उत्पन्न हुआ है, वे परम पुरुष हमारे इस शरीरके भीतर ही विराजमान हैं; उनको खोजनेके लिये कहीं
| २२२ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न ६ |
|---|
अन्यत्र नहीं जाना है। भाव यह है कि जब मनुष्यके हृदयमें परमात्माको पानेके लिये उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है, तब वे उसे वहीं उसके हृदयमें ही मिल जाते हैं॥ २ ॥
**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझनेके लिये संक्षेपसे सृष्टिक्रमका वर्णन करते हैं—
स ईक्षांचक्रे। कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥
सः=उसने; ईक्षांचक्रे=विचार किया (कि); कस्मिन्=(शरीरसे) किसके; उत्क्रान्ते=निकल जानेपर; अहम् उत्क्रान्तः=मैं (भी) निकला हुआ (सा); भविष्यामि=हो जाऊँगा; वा=तथा; कस्मिन् प्रतिष्ठिते=किसके स्थित रहनेपर; प्रतिष्ठास्यामि इति=मैं स्थित रहूँगा॥ ३॥
**व्याख्या—**महासर्गके आदिमें जगत्की रचना करनेवाले परम पुरुष परमेश्वरने विचार किया कि ‘मैं जिस ब्रह्माण्डकी रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन-सा तत्त्व डाला जाय कि जिसके न रहनेपर मैं स्वयं भी उसमें न रह सकूँ अर्थात् मेरी सत्ता स्पष्टरूपसे व्यक्त न रहे और जिसके रहनेपर मेरी सत्ता स्पष्ट प्रतीत होती रहे’॥ ३॥
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च॥ ४॥
(यह सोचकर सबसे पहले) सः=उसने; प्राणम् असृजत=प्राणकी रचना की; प्राणात् श्रद्धाम्=प्राणके बाद श्रद्धाको (उत्पन्न किया); खम् वायुः ज्योतिः आपः पृथिवी=(उसके बाद क्रमशः) आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी (ये पाँच महाभूत प्रकट हुए; फिर); मनः इन्द्रियम्=मन (अन्तःकरण) और इन्द्रियसमुदाय (की उत्पत्ति हुई); अन्नम्=(उसके बाद) अन्न हुआ; अन्नात्=अन्नसे; वीर्यम्=वीर्य (की रचना हुई, फिर); तपः=तप; मन्त्राः=नाना प्रकारके
प्रश्न ६ ] प्रश्नोपनिषद् २२३
मन्त्र; कर्म = नाना प्रकारके कर्म; च लोकाः = और उनके फलरूप भिन्न-भिन्न लोकों-(का निर्माण हुआ); च = और; लोकेषु = उन लोकोंमें; नाम = नाम (की रचना हुई) ॥ ४॥
व्याख्या— परब्रह्म परमेश्वरने सर्वप्रथम सबके प्राणरूप सर्वात्मा हिरण्यगर्भको बनाया। उसके बाद शुभकर्ममें प्रवृत्त करानेवाली श्रद्धा अर्थात् आस्तिक बुद्धिको प्रकट करके फिर क्रमशः शरीरके उपादानभूत आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—इन पाँच महाभूतोंकी सृष्टि की। इन पाँच महाभूतोंका कार्य ही यह दृश्यमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। पाँच महाभूतोंके बाद परमेश्वरने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—इन चारोंके समुदायरूप अन्तःकरणको रचा। फिर विषयोंके ज्ञान एवं कर्मके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियोंको उत्पन्न किया, फिर प्राणियोंके शरीरकी स्थितिके लिये अन्नकी और अन्नके परिपाकद्वारा बलकी सृष्टि की। उसके बाद अन्तःकरण और इन्द्रियोंके संयमरूप तपका प्रादुर्भाव किया। उपासनाके लिये भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी कल्पना की। अन्तःकरणके संयोगसे इन्द्रियोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंका निर्माण किया। उनके भिन्न-भिन्न फलरूप लोकोंको बनाया और उन सबके नाम-रूपोंकी रचना की। इस प्रकार सोलह कलाओंसे युक्त इस ब्रह्माण्डकी रचना करके जीवात्माके सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गये; इसीलिये वे सोलह कलाओंवाले पुरुष कहलाते हैं। हमारा यह मनुष्यशरीर भी ब्रह्माण्डका ही एक छोटा-सा नमूना है, अतः परमेश्वर जिस प्रकार इस सारे ब्रह्माण्डमें हैं, उसी प्रकार हमारे इस शरीरमें भी हैं और इस शरीरमें भी वे सोलह कलाएँ वर्तमान हैं। उन हृदयस्थ परमदेव पुरुषोत्तमको जान लेना ही उस सोलह कलावाले पुरुषको जान लेना है॥ ४॥
सम्बन्ध— सर्गके आरम्भका वर्णन करके जिन परब्रह्मका लक्ष्य कराया गया, उन्हींका अब प्रलयके वर्णनसे लक्ष्य कराते हैं—
स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य
२२४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ६ ]
परिद्वग्धुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥
सः=वह (प्रलयका दृष्टान्त) इस प्रकार है; यथा=जिस प्रकार; इमाः=ये; नद्यः=नदियाँ; समुद्रायणाः स्यन्दमानाः=समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती (और) बहती हुई; समुद्रम्=समुद्रको; प्राप्य=पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उसीमें) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे=उनके नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; समुद्रः इति एवम्=(फिर उनको) समुद्र इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; एवम् एव=इसी प्रकार; अस्य परिद्वग्धः=सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी; इमाः=ये (ऊपर बतायी हुई); षोडश कलाः=सोलह कलाएँ; पुरुषायणाः=जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य=(प्रलयकालमें) परम पुरुष परमात्माको पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं; च=तथा; आसाम्=इन सबके; नामरूपे=(पृथक्-पृथक्) नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; पुरुषः इति एवम्=(फिर उनको) 'पुरुष' इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; सः=वही; एषः=यह; अकलः=कलारहित (और); अमृतः=अमर परमात्मा; भवति=है; तत्=उसके विषयमें; एषः=यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है ॥ ५ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ (अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते। एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमें ये तदाकार हो जाती हैं। अतः उन्हींके नामसे, उन्हींके वर्णनसे इनका वर्णन होता
प्रश्न ६ ]
प्रश्नोपनिषद्
२२५
है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामें किसी प्रकारका संकल्प नहीं रहता। अतः वे समस्त कलाओंसे रहित, अमृतस्वरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है—॥५॥
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः।
तं वेदं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति॥६॥
रथनाभौ =रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अराः इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही); यस्मिन् =जिसमें; कलाः =ऊपर बतायी हुई सब कलाएँ; प्रतिष्ठिताः =सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम् =उस जाननेयोग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद =जानना चाहिये; यथा =जिससे (हे मनुष्यों!); वः =तुमलोगोंको; मृत्युः =मृत्यु; मा परिव्यथा इति =दुःख न दे सके॥६॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म-मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। वेदभगवान् मनुष्योंसे कहते हैं—‘जिस प्रकार रथके पहियेमें लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभमें प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभ है— नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओंके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनसे उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जाननेयोग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त संसारमें डालकर दुःखी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे॥६॥
तान्होवाचैतावदेवाहेतत्परं ब्रह्म वेद। नातः परमस्तीति॥७॥
ह =(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच =उन सबसे कहा; एतत् =इस; परम् ब्रह्म =परम ब्रह्मको; अहम् =मैं; एतावत् =इतना; एव =ही; वेद =जानता हूँ; अतः परम् =इससे पर (उत्कृष्ट तत्त्व); न =नहीं; अस्ति इति =है॥७॥