ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २११
पाँचों महाभूत, दसों इन्द्रियाँ और उनके विषय, चारों प्रकारके अन्तःकरण और उनके विषय तथा पाँच भेदोंवाला प्राणवायु—सब-के-सब परमात्माके ही आश्रित हैं। कहना यह है कि स्थूल पृथ्वी और उसका कारण गन्ध-तन्मात्रा, स्थूल जल-तत्त्व और उसका कारण रस-तन्मात्रा, स्थूल तेज-तत्त्व और उसका कारण रूप-तन्मात्रा, स्थूल वायु-तत्त्व और उसका कारण स्पर्श-तन्मात्रा, स्थूल आकाश और उसका कारण शब्द-तन्मात्रा—इस प्रकार अपने कारणोंसहित पाँचों भूत तथा नेत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा देखनेमें आनेवाली वस्तुएँ, श्रोत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा जो कुछ सुना जा सकता है वह सब, घ्राणेन्द्रिय और उसके द्वारा सूँघनेमें आनेवाले पदार्थ, रसना-इन्द्रिय और उसके द्वारा आस्वादनमें आनेवाले खट्टे-मीठे आदि सब प्रकारके रस, त्वचा-इन्द्रिय और उसके द्वारा स्पर्श करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, वाक्-इन्द्रिय और उसके द्वारा बोले जानेवाले शब्द, दोनों हाथ और उनके द्वारा पकड़नेमें आनेवाली सब वस्तुएँ, दोनों पैर और उनके गन्तव्य स्थान, उपस्थ-इन्द्रिय और मैथुनका सुख, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा त्यागा जानेवाला मल, मन और उसके द्वारा मनन करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, बुद्धि और उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले सब पदार्थ, अहंकार और उसका विषय, चित्त और चित्तके द्वारा चिन्तनमें आनेवाले पदार्थ, प्रभाव और प्रभावसे प्रभावित होनेवाली वस्तु एवं पाँच वृत्तिवाला प्राण और उसके द्वारा जीवन देकर धारण किये जानेवाले सब शरीर—ये सब-के-सब इसके कारणभूत परमेश्वरके ही आश्रित हैं॥ ८॥
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९॥
एषः=यह जो; द्रष्टा स्प्रष्टा=देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला; श्रोता घ्राता=सुननेवाला, सूँघनेवाला; रसयिता मन्ता=स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला; बोद्धा कर्ता=जाननेवाला तथा कर्म करनेवाला; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप; पुरुषः=पुरुष (जीवात्मा) है; सः हि=वह भी; अक्षरे=अविनाशी; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=भलीभाँति स्थित है॥ ९॥