ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| २१२ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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**व्याख्या—**देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके द्वारा समस्त कर्म करनेवाला जो यह विज्ञानस्वरूप पुरुष—जीवात्मा है, यह भी उन परम अविनाशी सबके आत्मा परब्रह्म पुरुषोत्तममें ही स्थिति पाता है। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर ही इसे वास्तविक शान्ति मिलती है; अतः इसके भी परम आश्रय वे परमेश्वर ही हैं॥ ९॥
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य। स सर्वज्ञः सर्वो भवति। तदेष श्लोकः॥ १०॥
ह यः वै=निश्चय ही जो कोई भी; तत् अच्छायम्=उस छायारहित; अशरीरम्=शरीररहित; अलोहितम्=लाल, पीले आदि रंगोंसे रहित; शुभ्रम् अक्षरम्=विशुद्ध अविनाशी पुरुषको; वेदयते=जानता है; सः=वह; परम् अक्षरम् एव=परम अविनाशी परमात्माको ही; प्रतिपद्यते=प्राप्त हो जाता है; सोम्य=हे प्रिय!; यः तु [एवम्]=जो कोई ऐसा है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ (और); सर्वः भवति=सर्वरूप हो जाता है; तत् एषः=उस विषयमें यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥
**व्याख्या—**यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि जो कोई भी मनुष्य उन छायारहित, शरीररहित, लाल-पीले आदि सब रंगोंसे रहित, विशुद्ध अविनाशी परमात्माको जान लेता है, वह परम अक्षर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हे सोम्य! जो कोई भी ऐसा है, अर्थात् जो भी उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है। इस विषयमें निम्नलिखित ऋचा है॥ १०॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः
प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र।