ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१३
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य
स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥
यत्र=जिसमें; प्राणाः=समस्त प्राण (और); भूतानि च=पाँचों भूत तथा; सर्वैः देवैः सह=सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तःकरणके सहित; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप आत्मा; सम्प्रतिष्ठन्ति=आश्रय लेते हैं; सोम्य=हे प्रिय!; तत् अक्षरम्=उस अविनाशी परमात्माको; यः तु वेदयते=जो कोई जान लेता है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ है; सर्वम् एव=(वह) सर्वस्वरूप परमेश्वरमें; आविवेश=प्रविष्ट हो जाता है; इति=इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समास हुआ) ॥ ११ ॥
व्याख्या—सबके परम कारण जिन परमेश्वरमें समस्त प्राण और पाँचों महाभूत तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके सहित स्वयं विज्ञानस्वरूप जीवात्मा—ये सब आश्रय लेते हैं, उन परम अक्षर अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है तथा सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह चतुर्थ प्रश्न समास हुआ ॥ ११ ॥
॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ४॥
पञ्चम प्रश्न
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥
अथ ह एनम्=उसके बाद इन ख्यातनामा महर्षि पिप्पलादसे; शैब्यः सत्यकामः=शिबिपुत्र सत्यकामने; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्; मनुष्येषु=मनुष्योंमेंसे; सः यः ह वै=वह जो कोई भी; प्रायणान्तम्=मृत्युपर्यन्त; तत् ओंकारम्=उस ओंकारका; अभिध्यायीत=सदा भलीभाँति ध्यान करता है; सः तेन=वह उस