ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५
उपासनाके बलसे; कतमम् लोकम्=किस लोकको; वाव जयति=निस्संदेह जीत लेता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सत्यकामने ओंकारकी उपासनाके विषयमें प्रश्न किया है। उसने यही जिज्ञासा की है कि जो मनुष्य आजीवन सदा ओंकारकी भलीभाँति उपासना करता है, उसे उस उपासनाके द्वारा कौन-से लोककी प्राप्ति होती है, अर्थात् उसका क्या फल मिलता है॥ १॥
तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥ २॥
तस्मै सः ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; सत्यकाम=हे सत्यकाम; एतत् वै=निश्चय ही यह; यत् ओंकारः=जो ओंकार है; परम् ब्रह्म च अपरम् च=(वही) परब्रह्म और अपरब्रह्म भी है; तस्मात्=इसलिये; विद्वान्=इस प्रकारका ज्ञान रखनेवाला मनुष्य; एतेन एव=इस एक ही; ायतनेन=अवलम्बसे (अर्थात् प्रणवमात्रके चिन्तनसे); एकतरम्=अपर और परब्रह्ममेंसे किसी एकका; अन्वेति=(अपनी श्रद्धाके अनुसार) अनुसरण करता है॥ २॥
**व्याख्या—**इसके उत्तरमें महर्षि पिप्पलाद 'ओम्' इस अक्षरकी उसके लक्ष्यभूत परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ एकता करते हुए कहते हैं—सत्यकाम! यह जो 'ॐ' है, वह अपने लक्ष्यभूत परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। इसलिये यही परब्रह्म है और यही उन परब्रह्मसे प्रकट हुआ उनका विराट्स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है।* केवल इसी एक ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करके उसके द्वारा अपने इष्टको चाहनेवाला विज्ञानसम्पन्न मनुष्य उसे पा लेता है। भाव यह है कि जो मनुष्य परमेश्वरके विराट्स्वरूप—इस जगत्के ऐश्वर्यमय किसी भी अङ्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे ओंकारकी उपासना करता है, वह अपनी भावनाके अनुसार विराट्स्वरूप परमेश्वरके किसी एक अङ्गको प्राप्त
* कठोपनिषद् १। २। १६ में भी यही बात कही है, वहाँ 'अपरम्' विशेषण नहीं दिया है।