ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१५
करता है और जो इसके अन्तर्यामी आत्मा पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तमको लक्ष्य बनाकर उनको पानेके लिये निष्कामभावसे इसकी उपासना करता है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तमको पा लेता है। यही बात अगले मन्त्रोंमें भी स्पष्ट की गयी है॥ २॥
स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते। तमृचो मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति॥ ३॥
सः यदि = वह उपासक यदि; एकमात्रम् = एक मात्रासे युक्त ओंकारका; अभिध्यायीत = भलीभाँति ध्यान करे तो; सः तेन एव = वह उस उपासनासे ही; संवेदितः = अपने ध्येयकी ओर प्रेरित किया हुआ; तूर्णम् एव = शीघ्र ही; जगत्याम् = पृथ्वीमें; अभिसम्पद्यते = उत्पन्न हो जाता है; तम् ऋचः = उसको ऋग्वेदकी ऋचाएँ; मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीर; उपनयन्ते = प्राप्त करा देती हैं; तत्र सः = वहाँ वह उपासक; तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नः = तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर; महिमानम् = महिमाका; अनुभवति = अनुभव करता है॥ ३॥
व्याख्या— ओंकारका चिन्तन करनेवाला मनुष्य यदि विराट् परमेश्वरके भूः, भुवः और स्वः—इन तीनों रूपोंमेंसे भूलोकके ऐश्वर्यमें आसक्त होकर उसकी प्राप्तिके लिये ओंकारकी उपासना करता है तो वह मरनेके बाद अपने प्रापणीय ऐश्वर्यकी ओर प्रेरित होकर तत्काल पृथ्वीलोकमें आ जाता है। ॐकारकी पहली मात्रा ऋग्वेदस्वरूपा है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध है; अतः उसके चिन्तनसे साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ पुनः मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट करा देती हैं। वह उस नवीन मनुष्य-जन्ममें तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न उत्तम आचरणोंवाला श्रेष्ठ मनुष्य बनकर अतिशय ऐश्वर्यका उपभोग करता है, अर्थात् उसे नीची योनियोंमें नहीं भटकना पड़ता, वह मरनेके बाद मनुष्य होकर पुनः शुभ कर्म करनेमें समर्थ हो जाता है और वहाँ नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है॥ ३॥