भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

२१६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५

अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥

अथ यदि=परंतु यदि; द्विमात्रेण=दो मात्राओंसे युक्त (ओंकारका); [ अभिध्यायीत ]=अच्छी प्रकार ध्यान करता है तो (उससे); मनसि=मनोमय चन्द्रलोकको; सम्पद्यते=प्राप्त होता है; सः यजुर्भिः=वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षमें स्थित; सोमलोकम्=चन्द्रलोकको; उन्नीयते=ऊपरकी ओर ले जाया जाता है; सः सोमलोके=वह चन्द्रलोकमें; विभूतिम्=वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभूय=अनुभव करके; पुनः आवर्तते=पुनः इस लोकमें लौट आता है॥ ४॥

व्याख्या— यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है; अर्थात् उस विराट्स्वरूप परमेश्वरके अङ्गभूत भूः (मनुष्यलोक) और भुवः (स्वर्गलोक)—इन दोनोंके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे—उसीको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है; उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमें ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमें पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्वकर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है॥ ४॥

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा। विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥

पुनः यः=परंतु जो; त्रिमात्रेण=तीन मात्राओंवाले; ओम् इति=ओमरूप; एतेन अक्षरेण एव=इस अक्षरके द्वारा ही; एतम् परम् पुरुषम्=इस परम पुरुषका;