ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१७
अभिध्यायीत=निरन्तर ध्यान करता है; सः तेजसि=वह तेजोमय; सूर्ये सम्पन्नः=सूर्यलोकमें जाता है; (तथा) यथा पादोदरः=जिस प्रकार सर्प; त्वचा विनिर्मुच्यते=केंचुलीसे अलग हो जाता है; एवम् ह वै=ठीक उसी तरह; सः पाप्मना=वह पापोंसे; विनिर्मुक्तः=सर्वथा मुक्त हो जाता है; सः=(इसके बाद) वह; सामभिः=सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा; ब्रह्मलोकम् उन्नीयते=ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है; सः एतस्मात्=वह इस; जीवघनात्=जीवसमुदायरूप; परात् परम्=परमतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ; पुरिशयम्=शरीररूप नगरमें रहनेवाले अन्तर्यामी; पुरुषम्=परमपुरुष पुरुषोत्तमको; ईक्षते=साक्षात् कर लेता है; तत् एतौ=इस विषयमें ये (अगले); श्लोकौ भवतः=दो श्लोक हैं॥५॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें 'पुनः' शब्दके प्रयोगसे यह सूचित होता है कि उपर्युक्त कथनके अनुसार इस लोक और स्वर्गलोकतकके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे अपर ब्रह्मको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवाले साधकोंसे विलक्षण साधकका यहाँ वर्णन किया गया है। उपासनाका सर्वोत्तम प्रकार यही है—यह भाव प्रकट करनेके लिये ही इस मन्त्रमें 'यदि' पदका प्रयोग भी नहीं किया गया है; क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है। इस मन्त्रमें यह भी स्पष्टरूपसे बतला दिया गया है कि ओंकार उस परब्रह्मका नाम है, इसके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना की जाती है। मन्त्रमें कहा गया है कि जो कोई साधक इन तीन मात्राओंवाले ओंकारस्वरूप अक्षरद्वारा परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना करता है, वह जैसे सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है—उसी प्रकार सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे छूटकर सर्वथा निर्विकार हो जाता है। उसे सामवेदके मन्त्र तेजोमय सूर्यमण्डलमेंसे ले जाकर सर्वोपरि ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं। वहाँ वह जीव समुदायरूप चेतनतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ उन परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है, जो सम्पूर्ण जगत्को अपनी शक्तिके किसी एक अंशमें धारण किये हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं तथा जो अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं। इसी विषयको स्पष्ट करनेवाले ये दो आगे कहे हुए श्लोक हैं॥५॥