भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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२१८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः॥ ६॥

तिस्रः मात्राः=ओंकारकी तीनों मात्राएँ (‘अ’, ‘उ’ तथा ‘म’); अन्योन्यसक्ताः=एक दूसरीसे संयुक्त रहकर; प्रयुक्ताः=प्रयुक्त की गयी हों; अनविप्रयुक्ताः=या पृथक्-पृथक् एक-एक ध्येयके चिन्तनमें इनका प्रयोग किया गया हो (दोनों प्रकारसे ही वे); मृत्युमत्यः=मृत्युयुक्त हैं; बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु=बाहर, भीतर और बीचकी; क्रियासु=क्रियाओंमें; सम्यक्प्रयुक्तासु=पूर्णतया इन मात्राओंका प्रयोग किये जानेपर; ज्ञः न कम्पते=उस परमेश्वरको जाननेवाला ज्ञानी विचलित नहीं होता॥ ६॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें यह भाव दिखाया गया है कि ओंकारवाच्य परब्रह्म परमेश्वरका जो यह जगत्-रूप विराट्-स्वरूप है अर्थात् जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, यह उसका वास्तविक परम अविनाशी स्वरूप नहीं है, यह परिवर्तनशील है; अतः इसमें रहनेवाला जीव अमर नहीं होता। वह चाहे ऊँची-से-ऊँची योनिको प्राप्त कर ले, परंतु जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छूटता। इसके एक अङ्ग पृथ्वीलोककी या पृथ्वी और अन्तरिक्ष इन दोनों लोकोंकी अथवा तीनों लोकोंको मिलाकर सम्पूर्ण जगत्की अभिलाषा रखते हुए जो उपासना करता है, जिसका इस जगत्के आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी ओर लक्ष्य नहीं है, वरं जो जगत्के बाह्य स्वरूपमें ही आसक्त हो रहा है, वह उन्हें नहीं पाता, अतः बार-बार जन्मता-मरता रहता है। उन्हें तो वही साधक पा सकता है, जो अपने शरीरके बाहर, भीतर और शरीरके मध्यस्थान—हृदयदेशमें होनेवाली बाहरी, भीतरी और बीचकी समस्त क्रियाओंमें सर्वत्र ओंकारके वाच्यार्थरूप एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तमको व्याप्त समझता है और ओंकारके द्वारा उनकी उपासना करता है—उन्हें पानेकी ही अभिलाषासे ओंकारका जप, स्मरण