भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१९


और चिन्तन करता है, वह ज्ञानी परमात्माको पाकर फिर कभी अपनी स्थितिसे विचलित नहीं होता ॥ ६ ॥

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं
सामभिर्यत् तत्कवयो वेदयन्ते।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्
यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७॥

ऋग्भिः=(एक मात्राकी उपासनासे उपासक) ऋचाओंद्वारा; एतम्=इस मनुष्यलोकमें (पहुँचाया जाता है); यजुर्भिः=(दूसरा दो मात्राओंकी उपासना करनेवाला) यजुः श्रुतियोंद्वारा; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षमें (चन्द्रलोकतक पहुँचाया जाता है); सामभिः=(पूर्णरूपसे ओंकारकी उपासना करनेवाला) सामश्रुतियोंद्वारा; तत्=उस ब्रह्मलोकमें (पहुँचाया जाता है); यत्=जिसको; कवयः=ज्ञानीजन; वेदयन्ते=जानते हैं; विद्वान्=विवेकशील साधक; ओङ्कारेण एव=केवल ओंकाररूप; आयतनेन=अवलम्बनके द्वारा ही; तम्=उस परब्रह्म पुरुषोत्तमको; अन्वेति=पा लेता है; यत्=जो; तत्=वह; शान्तम्=परम शान्त; अजरम्=जरारहित; अमृतम्=मृत्युरहित; अभयम्=भयरहित; =और; परम् इति=सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें तीसरे, चौथे और पाँचवें मन्त्रोंके भावका संक्षेपमें वर्णन करके ब्राह्मण-ग्रन्थके वाक्योंमें कही हुई बातका समर्थन किया गया है। भाव यह है कि एक मात्रा अर्थात् एक अङ्गको लक्ष्य बनाकर उपासना करनेवाले साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ मनुष्यलोकमें पहुँचा देती हैं। दो मात्राकी उपासना करनेवालेको अर्थात् जगत्के ऊँचे-से-ऊँचे—स्वर्गीय ऐश्वर्यको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करनेवालेको यजुर्वेदके मन्त्र चन्द्रलोकमें ले जाते हैं और जो इन सबमें परिपूर्ण इनके आत्मस्वरूप परमेश्वरकी ओंकारके द्वारा उपासना करता है, उसको सामवेदके मन्त्र उस ब्रह्मलोकमें पहुँचा देते हैं, जिसे ज्ञानीजन जानते हैं। सम्पूर्ण रहस्यको समझनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य बाह्य जगत्में आसक्त न होकर ओंकारकी उपासनाद्वारा समस्त जगत्के आत्मरूप उन परब्रह्म